कोच्चि: केरल हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि धार्मिक स्थलों से जुड़े नियम आपसी सौहार्द बढ़ाने के लिए होने चाहिए, न कि समाज में दूरियां पैदा करने के लिए। अदालत ने अडूर स्थित श्री पार्थसारथी मंदिर में दो ईसाई पादरियों के प्रवेश के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि अतिथि के तौर पर मंदिर आना किसी 'अधिकार' के तौर पर प्रवेश करने से पूरी तरह अलग है।
क्या था मामला?
दरअसल, मंदिर के एक कार्यक्रम में दो ईसाई पादरियों को सम्मानित अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। इस निमंत्रण को चुनौती देते हुए कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि यह केरल हिंदू पूजा स्थल (प्रवेश का अधिकार) अधिनियम, 1965 का उल्लंघन है, जो गैर-हिंदुओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करने की बात करता है।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस पी.जी. अजितकुमार की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए मानवता और सामाजिक सद्भाव पर ज़ोर दिया। कोर्ट ने कहा:
"कानून का उद्देश्य समुदायों के बीच कलह पैदा करना नहीं, बल्कि उनमें एकता और भाईचारा पैदा करना होना चाहिए। पादरियों को वहां मेहमान के तौर पर बुलाया गया था, वे वहां अपना अधिकार जताने या पूजा के नियमों में हस्तक्षेप करने नहीं गए थे।"
'अतिथि' और 'अधिकार' के बीच का अंतर
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में एक महीन लेकिन महत्वपूर्ण कानूनी अंतर को स्पष्ट किया:
अतिथि (Guest): किसी को सम्मानपूर्वक आमंत्रित करना एक सामाजिक परंपरा है, जो अधिनियम के दायरे में नहीं आती।
प्रवेश का अधिकार (Right to Entry): अधिनियम उन स्थितियों पर लागू होता है जहाँ कोई व्यक्ति धार्मिक अनुष्ठान या अधिकार के तौर पर प्रवेश का दावा करता है।
सांस्कृतिक एकता की मिसाल
अदालत ने कहा कि केरल का इतिहास विभिन्न धर्मों के बीच आपसी सम्मान का रहा है। मंदिर समिति द्वारा अन्य धर्म के गुरुओं को आमंत्रित करना इसी साझा संस्कृति का हिस्सा है। इस फैसले के बाद कानूनी जानकारों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में धार्मिक आयोजनों में सामाजिक समावेशिता को बढ़ावा देने वाला साबित होगा।





