चंडीगढ़। पंजाब के परिवहन विभाग में हुए बहुचर्चित वीआईपी (फैंसी) नंबर घोटाले को लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के प्रति कड़ा रुख अपनाया है। बार-बार आदेश के बावजूद जवाब दाखिल न करने पर अदालत ने सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए 10,000 रुपये का जुर्माना ठोंका है। साथ ही, हलफनामा दाखिल करने के लिए यह 'अंतिम अवसर' प्रदान किया गया है।
क्या है पूरा विवाद?
यह मामला वीआईपी नंबरों को अधिकारियों की मिलीभगत से औने-पौने दामों पर बेचने से जुड़ा है। याचिकाकर्ता गुरसाहिब सिंह ने फिरोजपुर के डीटीओ (DTO) कार्यालय में हुई धांधली का हवाला देते हुए अदालत को बताया था कि:
परिवहन विभाग द्वारा फैंसी नंबर उनकी निर्धारित सरकारी फीस से भी कम कीमत पर आवंटित किए जा रहे हैं।
डीटीओ ने नियमों को ताक पर रखकर चरणदीप सिंह नामक व्यक्ति को बेहद कम कीमत पर नंबर जारी किया, जो वास्तव में डीटीओ ने अपने ही नाम पर लिया था।
अदालत की नाराजगी की मुख्य वजह
सुनवाई के दौरान जब राज्य सरकार ने स्टेटस रिपोर्ट के लिए एक सप्ताह का समय मांगा, तो अदालत ने तीखी टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने कहा:
पुराने आदेशों की अवहेलना: यह मामला सितंबर 2024 से लंबित है, फिर भी अब तक आवश्यक कार्रवाई नहीं की गई।
प्रशासनिक विफलता: सरकार ने देरी का कारण दो समानांतर मुकदमों को बताया, जिस पर कोर्ट ने कहा कि राज्य के पास वकीलों की बड़ी फौज होने के बावजूद जवाब में देरी समझ से परे है।
आपराधिक मामला क्यों नहीं? हाईकोर्ट ने पहले भी पूछा था कि आरोपी चरणदीप सिंह पर केवल विभागीय कार्रवाई ही क्यों की जा रही है, उन पर आपराधिक मुकदमा (FIR) दर्ज क्यों नहीं किया गया?
जुर्माना और भविष्य की कार्रवाई
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक समन्वय की कमी के कारण न्यायिक प्रक्रिया में देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
"अदालत ने सरकार को ₹10,000 का जुर्माना भरने का आदेश दिया है और स्पष्ट किया है कि यदि अगली सुनवाई तक संतोषजनक हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, तो सख्त दंडात्मक कदम उठाए जा सकते हैं।"
अब इस मामले की अगली सुनवाई पर सबकी नज़रें टिकी हैं, जहाँ सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि करोड़ों के राजस्व को चूना लगाने वाले अधिकारियों और लाभार्थियों पर क्या ठोस कार्रवाई की गई है।





