कोलकाता। पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावों से पहले विशेष मतदाता सूची (SIR) को लेकर मचा सियासी घमासान अब कानूनी पेचीदगियों में फंस गया है। मुर्शिदाबाद के फरक्का से कांग्रेस उम्मीदवार का नाम SIR सूची में शामिल न होने के मामले पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि इस संवेदनशील विषय पर अब केवल देश की सर्वोच्च अदालत ही फैसला लेगी।

हाईकोर्ट ने क्यों झाड़ा पल्ला?

कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल ने याचिका पर सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट वर्तमान में SIR से संबंधित सभी मामलों की सीधे निगरानी कर रहा है। अदालत ने कहा:

"सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि कोई भी हाईकोर्ट SIR से जुड़े मामलों की सुनवाई नहीं करेगा। हम केवल प्रशासनिक कार्यों की देखरेख कर रहे हैं। याचिकाकर्ता को अपनी गुहार लेकर सीधे शीर्ष अदालत जाना होगा।"

अब कांग्रेस उम्मीदवार के वकील महताब शेख इस मामले को 1 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखेंगे।

क्या है पूरा विवाद?

याचिकाकर्ता का दावा है कि उम्मीदवार के नाम की आधिकारिक घोषणा हो जाने के बावजूद, उनका नाम विशेष मतदाता सूची (SIR) में नजर नहीं आ रहा है। यह तकनीकी खामी है या जानबूझकर की गई कार्रवाई, इसे लेकर कांग्रेस खेमे में भारी नाराजगी है।

TMC और ममता बनर्जी के गंभीर आरोप

SIR के मुद्दे पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) भी चुनाव आयोग पर हमलावर है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनावी जनसभाओं में इस मुद्दे को उठाते हुए आरोप लगाया है कि:

चुनाव आयोग भाजपा के इशारे पर काम कर रहा है।

जानबूझकर टीएमसी उम्मीदवारों और उनके परिजनों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं या प्रक्रिया को जटिल बनाया जा रहा है।

टीएमसी के 11 उम्मीदवारों के नाम विचाराधीन थे, जिनमें से काजल शेख और शशि पांजा के नाम तो शामिल कर लिए गए, लेकिन शेष 9 नामों पर सस्पेंस बरकरार है।

चुनाव आयोग की चुप्पी

तृणमूल कांग्रेस इस संबंध में जल्द ही चुनाव आयोग को एक औपचारिक ज्ञापन सौंपने की तैयारी में है। हालांकि, 'सत्यापन' के नाम पर मतदाताओं के नाम अलग रखने के आरोपों पर चुनाव आयोग ने अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में SIR अब एक ऐसा हथियार बन गया है, जो चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहा है। अब सभी की निगाहें 1 अप्रैल को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं।