नई दिल्ली/वाशिंगटन:

ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष में अमेरिकी खजाने से पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। पेंटागन के ताजा अनुमानों के मुताबिक, इस युद्ध में अमेरिका अब तक 45.1 अरब डॉलर (करीब 4.30 लाख करोड़ रुपये) खर्च कर चुका है। यह आंकड़ा भारत के पड़ोसी देश नेपाल की कुल सालाना अर्थव्यवस्था (GDP) के लगभग बराबर है।

आईएमएफ (IMF) के अनुसार, वर्ष 2026 में नेपाल की अनुमानित जीडीपी 45.84 बिलियन डॉलर है। यानी अमेरिका ने जितने पैसे केवल कुछ महीनों की लड़ाई में फूंक दिए, उतने में नेपाल जैसा पूरा देश खड़ा किया जा सकता है।

CNN की रिपोर्ट: पेंटागन के अनुमान में क्या है शामिल?

CNN द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, पेंटागन ने हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस (संसद) को युद्ध के खर्च का नया आंकड़ा सौंपा है:

  • कुल अनुमान: 3 सितंबर 2026 तक युद्ध से जुड़े 43.6 बिलियन डॉलर और ईंधन (Fuel) के अतिरिक्त 1.5 बिलियन डॉलर मिलाकर कुल खर्च 45.1 बिलियन डॉलर पहुंच गया है।
  • अधूरा आंकड़ा: विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा भी युद्ध की पूरी लागत नहीं दर्शाता। इसमें क्षतिग्रस्त हुए अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इमारतों की मरम्मत का खर्च, अप्रत्यक्ष ऑपरेशनल कॉस्ट और राजनयिक अभियानों का खर्च शामिल नहीं है।
  • लागत में लगातार उछाल: इससे पहले पेंटागन ने जुलाई में 37.5 बिलियन डॉलर और कांग्रेसनल बजट ऑफिस (CBO) ने 1 अगस्त तक 38 बिलियन डॉलर का खर्च जताया था।

हर महीने 2 से 3 अरब डॉलर का भारी-भरकम बोझ

कांग्रेसनल बजट ऑफिस (CBO) की 15 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, लड़ाई जारी रहने तक यह 'वॉर बिल' लगातार बढ़ता रहेगा:

  • मासिक परिचालन लागत: यदि लड़ाई का स्तर मई-जून जैसा रहता है, तो अमेरिका को हर महीने लगभग 2 अरब डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं। वहीं, जुलाई जैसे भीषण संघर्ष की स्थिति में यह खर्च बढ़कर 3 अरब डॉलर प्रति माह तक पहुंच जाता है।
  • खर्च के मुख्य कारण: मिसाइल व गोला-बारूद की भारी खपत, लड़ाकू विमानों के उड़ान घंटों (Flight Hours) में बढ़ोतरी, नौसैनिक बेड़ों की तैनाती, रसद (Logistics), रखरखाव और महंगे ईंधन की खपत।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर: बढ़ सकती है महंगाई

CBO ने चेतावनी दी है कि इस युद्ध का प्रतिकूल प्रभाव केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी झटके दे रहा है:

  • ऊर्जा संकट: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से क्रूड ऑयल और नेचुरल गैस तथा लाल सागर (Red Sea) से शिपिंग बाधित होने के कारण ग्लोबल एनर्जी प्राइज तेजी से बढ़े हैं।
  • महंगाई में उछाल: बढ़े हुए तेल-गैस दामों के चलते 2027 की पहली तिमाही तक पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (PCE) इन्फ्लेशन रेट में 0.5% अंक और कोर PCE महंगाई में 0.3% अंक की बढ़ोतरी का अनुमान है।