प्रयागराज/नई दिल्ली: गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) की जिलाधिकारी (DM) मेधा रूपम और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के वेतन से ₹5 लाख का मुआवजा वसूलने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के कड़े आदेश के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है। देश के सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि राज्य सरकार हाई कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ जल्द ही विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करेगी।
हाई कोर्ट ने NSA की कार्रवाई को बताया था 'मजाक' इससे पहले, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्टूडेंट-एक्टिविस्ट आकृति चौधरी के खिलाफ लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत के आदेश को रद्द कर दिया था। नोएडा में मजदूर विरोध-प्रदर्शन के दौरान आकृति की भूमिका को लेकर की गई प्रशासनिक कार्रवाई पर अदालत ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की थी:
- सबूतों का अभाव: कोर्ट ने हिरासत के आधारों को पूरी तरह से अटकलों पर आधारित और ठोस साक्ष्यों से रहित पाया था।
- अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड पर असर: अदालत ने इस कार्रवाई को कानून का मजाक करार देते हुए निर्देश दिया था कि संबंधित अधिकारियों की सर्विस बुक/रिकॉर्ड में कोर्ट की इस सख्त प्रतिकूल टिप्पणी को दर्ज किया जाए।
- वेतन से हर्जाना: लापरवाही और अवैध हिरासत के लिए अदालत ने ₹5 लाख का मुआवजा मंजूर किया और स्पष्ट किया कि यह राशि सरकारी खजाने के बजाय जिम्मेदार अधिकारियों की सैलरी से वसूली जाए।
क्या है पूरा मामला?
- गिरफ्तारी व NSA: स्टूडेंट-एक्टिविस्ट आकृति चौधरी को अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए मजदूर आंदोलन के दौरान हिंसा भड़काने के आरोपों में पुलिस ने गिरफ्तार किया था। इसके बाद उन पर कड़ा कानून NSA लागू कर दिया गया, जिसके कारण वे लगभग पांच महीने तक हिरासत में रहीं।
- कानूनी चुनौती: जब मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने पाया कि एनएसए लगाने के लिए प्रशासन के पास कोई पर्याप्त या ठोस सामग्री मौजूद नहीं थी।
अदालत ने इसे एक 'सामान्य प्रशासनिक चूक' न मानते हुए गंभीर अधिकारों का हनन करार दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से यह तय होगा कि क्या अधिकारियों के व्यक्तिगत वेतन से मुआवजे की कटौती का आदेश बरकरार रहता है या राज्य सरकार को इसमें कोई राहत मिलती है।





