ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर गहरा गया है। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (होर्मुज जलडमरूमध्य) को खोलने के लिए अमेरिका के जवाब को खारिज कर दिया है। तेहरान का स्पष्ट कहना है कि अमेरिका ने उसकी 7 शर्तों में से कुछ पर तो सहमति जताई है, लेकिन बाकी महत्वपूर्ण बिंदुओं पर उसका रुख अब भी स्पष्ट नहीं है। जब तक सभी शर्तें पूरी नहीं होतीं, तब तक न तो होर्मुज का रास्ता खुलेगा और न ही कोई नई बातचीत होगी।
समझौता क्यों और कहाँ अटका?
- कतर की मध्यस्थता: अमेरिका और ईरान के बीच संदेशों के आदान-प्रदान के लिए कतर माध्यम की भूमिका निभा रहा है। अमेरिका ने कतर के जरिए ही अपना जवाब ईरान तक पहुंचाया था।
- इस्लाबाद समझौता: ईरान चाहता है कि दोनों देश जून में हुए इस्लामाबाद समझौते के बेहतर और व्यावहारिक स्वरूप पर लौटें, जिससे कुछ समय के लिए संघर्ष थमा था। इसमें होर्मुज की सुरक्षा और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दे शामिल थे।
- प्राथमिकता का विवाद: रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुख्य विवाद शर्तों को लेकर नहीं, बल्कि इस बात को लेकर है कि इनमें से कौन-सी शर्त सबसे पहले पूरी की जाएगी।
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परमाणु कार्यक्रम पर ईरान का कड़ा रुख
ईरान ने उन तमाम खबरों को सिरे से खारिज कर दिया है, जिनमें दावा किया जा रहा था कि वह प्रतिबंधों में ढील के बदले संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी एजेंसी (IAEA) को जांच की अनुमति देने के लिए तैयार है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी प्रस्तावों में ज्यादातर पुरानी और एकतरफा मांगें शामिल हैं। वर्तमान में ईरान की सर्वोच्च प्राथमिकता केवल होर्मुज क्षेत्र में सुरक्षा बहाल करना है।
दुनिया पर मंडराता संकट
फरवरी के अंत में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों से पहले, दुनिया का लगभग 20% तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का व्यापार इसी होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता था। यह रास्ता बंद रहने से वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति और ईंधन की कीमतों के प्रभावित होने का गंभीर खतरा बना हुआ है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बघेर गलीबाफ ने दो टूक कहा है कि अमेरिका अपनी एकतरफा शर्तों के जरिए इस प्रक्रिया को ज्यादा दिनों तक खींच नहीं सकता।
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