देहरादून:
उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर बड़ा मामला सामने आया है। राज्य में नाम हटाने के लिए आए करीब 1.73 लाख 'फॉर्म-7' के आवेदनों की जांच में 95 हजार से अधिक मतदाता अपात्र पाए गए हैं। चुनाव अधिकारियों ने इन्हें दस्तावेज उपलब्ध न कराने या सुनवाई के दौरान उपस्थित न होने की श्रेणी में रखा है।
इस खुलासे के बाद प्रदेश में राजनीतिक बयानबाजी और विवाद तेज हो गया है। हालांकि, मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि अपात्र श्रेणी में रखे जाने का मतलब यह कतई नहीं है कि इन 95 हजार मतदाताओं के नाम अंतिम रूप से मतदाता सूची से काट दिए गए हैं।
कैसे तैयार होता है 'फॉर्म-7'?
मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के अनुसार:
- जब सत्यापन प्रक्रिया के दौरान कोई मतदाता मांगे गए दस्तावेज जमा नहीं करता या व्यक्तिगत/पारिवारिक सुनवाई में उपस्थित नहीं होता, तो ERO/AERO द्वारा ऑनलाइन पोर्टल पर उसे 'अपात्र' दर्ज किया जाता है।
- इस प्रविष्टि के बाद स्वतः ही प्रक्रिया के तहत फॉर्म-7 तैयार होता है, जिसका उपयोग मतदाता सूची से नाम हटाने या आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है।
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मैदानी जिलों में सबसे ज्यादा आवेदन, 4 जिलों की हिस्सेदारी 85% से अधिक
SIR प्रक्रिया के दौरान दावे और आपत्तियों के तहत कुल 1,30,382 से अधिक फॉर्म-7 प्राप्त हुए थे, जिनमें से 85 प्रतिशत से अधिक आवेदन केवल चार जिलों—ऊधम सिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून और नैनीताल से आए हैं। मैदानी और अधिक आबादी वाले इन जिलों में नाम हटाने के आवेदनों की इतनी बड़ी संख्या ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक घमासान:
- भाजपा का रुख: भारतीय जनता पार्टी ने इन मैदानी इलाकों में अधिक आवेदनों का मुख्य कारण पहाड़ों से आबादी का पलायन और लोगों का स्थान बदलना बताया है।
- कांग्रेस के सवाल: वहीं कांग्रेस ने सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या इन जिलों की जनसांख्यिकीय संरचना (Demographic Pattern) में आ रहा बदलाव इस पैटर्न की मुख्य वजह है?
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने सभी राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे आंकड़ों के आधार पर सीधे सामाजिक या राजनीतिक निष्कर्ष न निकालें, क्योंकि यह संख्या मतदाता सूची की गहनता और सक्रिय जांच को दर्शाती है।
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चुनाव आयोग का आश्वासन: पारदर्शी प्रक्रिया और 3 अक्टूबर के बाद भी मौका
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि उत्तराखंड में SIR की पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत पूर्णतः पारदर्शी तरीके से चलाई जा रही है। विधानसभा, जिला और राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के साथ नियमित बैठकें की जा रही हैं।
मतदाताओं के लिए राहत की खबर: जिन मतदाताओं को 'अपात्र' श्रेणी में रखा गया है, उनका मताधिकार छीनने की प्रक्रिया अंतिम नहीं है:
- 3 अक्टूबर को अंतिम प्रकाशन: मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन के बाद भी आम जनता के पास विकल्प खुला रहेगा।
- फॉर्म-6 से दोबारा जुड़ेगा नाम: यदि कोई पात्र मतदाता छूट गया है, तो वह आवश्यक दस्तावेजों के साथ फॉर्म-6 भरकर पुनः अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर सकता है।





