नई दिल्ली:
भारत को कृषि सुरक्षा और कृषि-रसायन (एग्रोकेमिकल) क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने तथा चीन पर निर्भरता समाप्त करने के लिए एग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया (ACFI) ने केंद्र सरकार से एक महत्वाकांक्षी प्रोत्साहन योजना की मांग की है। देश की शीर्ष क्रॉप प्रोटेक्शन इंडस्ट्री बॉडी ACFI ने दिग्गज कंसल्टेंसी फर्म KPMG के साथ मिलकर तैयार किए गए एक विस्तृत नॉलेज पेपर के माध्यम से 5,000 से 7,000 करोड़ रुपये का डेडिकेटेड सपोर्ट प्रोग्राम शुरू करने का प्रस्ताव रखा है।
नई दिल्ली में आयोजित संघ की वार्षिक साधारण सभा (AGM) के दौरान जारी इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य भारतीय उद्योग की संरचनात्मक लागत (Structural Cost) विषमताओं को दूर करना और अगले 7 से 8 वर्षों के भीतर 'टेक्निकल्स' और 'केमिकल इंटरमीडिएट्स' के घरेलू उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करना है।
रणनीतिक मजबूती और इकोसिस्टम प्रतिस्पर्धा पर जोर
बैठक को संबोधित करते हुए ACFI के अध्यक्ष राहुल धानुका ने कहा:
"क्रॉप प्रोटेक्शन सेक्टर में भारत के विकास का अगला चरण केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं हो सकता। इसके लिए हमें अपने पूरे इकोसिस्टम को प्रतिस्पर्धी बनाना होगा। नवाचार के व्यवसायीकरण में तेजी लाना, सप्लाई चेन को लचीला बनाना और अंतरराष्ट्रीय बाजार के मुकाबले लागत में मिलने वाले नुकसान को कम करना हमारी प्राथमिक प्राथमिकता है।"
रिपोर्ट में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि उद्योग को किसी स्थायी सब्सिडी की आवश्यकता नहीं है, बल्कि एक निश्चित समय अवधि के लिए लक्षित (Targeted) सरकारी सहायता की दरकार है ताकि भारतीय कंपनियां वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें।
ACFI-KPMG प्रस्ताव की मुख्य मांगें
उद्योग संघ ने बजट पूर्व चर्चाओं के बीच सरकार के समक्ष ठोस मांगों का एक ढांचा प्रस्तुत किया है:
- उत्पादन आधारित इंसेंटिव (PLI): घरेलू टेक्निकल और इंटरमीडिएट निर्माताओं के लिए इंक्रीमेंटल बिक्री पर 5% से 8% तक का प्रोत्साहन इंसेंटिव।
- बिजली व अवशिष्ट उपचार पर राहत: औद्योगिक बिजली दरों और साझा कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट्स (CETP) के संचालन पर 30% से 40% की सब्सिडी। चीन के प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले ये दोनों मद भारतीय निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी आवर्ती लागत (Recurring Cost) हैं।
- एग्रोकेमिकल पार्क्स का निर्माण: साझा यूटिलिटीज और क्लस्टर-आधारित बुनियादी ढांचे से लैस समर्पित पार्क्स की स्थापना।
- सिंगल-विंडो डिजिटल प्लेटफॉर्म: केंद्र और राज्य स्तर की जटिल रेगुलेटरी मंजूरियों को सुगम बनाने के लिए एक एकीकृत डिजिटल ढांचा।
- आरएंडडी और बायोलॉजिकल्स को बढ़ावा: विशेष अनुसंधान (R&D) के लिए कैपिटल ग्रांट, पायलट मैन्युफैक्चरिंग सुविधाएं और गुड लेबोरेटरी प्रैक्टिस (GLP) प्रमाणित परीक्षण प्रयोगशालाएं स्थापित करने हेतु वित्तीय सहायता।
चीन पर निर्भरता: भारत की सबसे बड़ी कमजोरी
वर्तमान में भारत मात्रा (Volume) के आधार पर दुनिया के सबसे बड़े क्रॉप प्रोटेक्शन उत्पादकों और निर्यातकों में से एक है। हालांकि, इसका एक बड़ा हिस्सा चीन से आयात होने वाले 'टेक्निकल-ग्रेड एक्टिव इंग्रीडिएंट्स' और 'केमिकल इंटरमीडिएट्स' पर निर्भर करता है।
चीनी उत्पादकों को बड़े पैमाने पर उत्पादन (Economies of Scale), रियायती बिजली और पहले से स्थापित केमिकल पार्क्स का बहुत बड़ा लाभ मिलता है, जिसके कारण भारतीय निर्माता लागत के मामले में पिछड़ जाते हैं। ACFI का यह नया प्रस्ताव इस बुनियादी अंतर को खत्म करने की दिशा में अब तक का सबसे स्पष्ट और रणनीतिक प्रयास है।
| मुख्य पैरामीटर | वर्तमान स्थिति | ACFI प्रस्ताव का लक्ष्य |
| इंटरमीडिएट आपूर्ति | चीन पर अत्यधिक निर्भरता | घरेलू उत्पादन से आत्मनिर्भरता |
| नियामक प्रक्रियाएँ | केंद्र व राज्य स्तर पर बहुस्तरीय अप्रूवल | सिंगल डिजिटल प्लेटफॉर्म |
| बायो-क्रॉप प्रोटेक्शन | सीमित GLP लैब इंफ्रास्ट्रक्चर | वैश्विक मानकों के GLP लैब्स का निर्माण |
अंतरराष्ट्रीय बाजार और वैश्विक सप्लाई चेन पर प्रभाव
यह प्रस्ताव केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर वैश्विक एग्रीबिजनेस पर पड़ेगा:
- वैश्विक सप्लाई चेन में स्थिरता: भारत पहले से ही अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया को तैयार एग्रोकेमिकल्स का निर्यात करता है। कच्चे माल (Intermediates) का घरेलू उत्पादन बढ़ने से ग्लाइफोसेट जैसे हर्बिसाइड्स के बाजार में होने वाले चीनी मूल्य-उतार-चढ़ाव और आपूर्ति व्यवधानों से वैश्विक बाजारों को सुरक्षा मिलेगी।
- बायोलॉजिकल्स में भारत का नेतृत्व: जैविक और पर्यावरण-अनुकूल बायो-बेस्ड क्रॉप प्रोटेक्शन की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही है। यदि इस योजना को मंजूरी मिलती है, तो भारत दुनिया भर के बहुराष्ट्रीय और generic निर्माताओं के लिए नया मैन्युफैक्चरिंग हब बन सकता है।
आगे की राह: नीतिगत फैसले का इंतजार
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह प्रस्ताव फिलहाल उद्योग जगत की एक सिफारिश है, जिसे विचारार्थ सरकार को सौंपा गया है। इसे अभी आधिकारिक नीति के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है।
इस योजना का क्रियान्वयन भविष्य में रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय, कृषि मंत्रालय और संबंधित राज्य सरकारों के बीच बजटीय आवंटन तथा अंतर-मंत्रालयी समन्वय पर निर्भर करेगा। फिलहाल सरकार की ओर से इस पर निर्णय लेने के लिए कोई समय-सीमा घोषित नहीं की गई है।





