कोलकाता: कलकत्ता हाईकोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी के खिलाफ बार-बार दर्ज कराई जा रही आपराधिक शिकायतों पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘अब बहुत हो गया’। इसके साथ ही अदालत ने संकेत दिया है कि यदि बनर्जी के खिलाफ इसी तरह आधारहीन शिकायतें दर्ज कराने का सिलसिला जारी रहा, तो भविष्य में उनके खिलाफ नई FIR दर्ज करने से पहले हाईकोर्ट की पूर्व अनुमति अनिवार्य की जा सकती है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने राहत प्रदान करते हुए निर्देश दिया कि 30 नवंबर तक अभिषेक बनर्जी के खिलाफ किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई (Coercive Action) नहीं की जाएगी।
‘सुवेंदु अधिकारी मामले की तर्ज पर दिया जा सकता है आदेश’
अभिषेक बनर्जी की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत को अवगत कराया गया कि पूर्व में मिली अंतरिम सुरक्षा के बावजूद उनके खिलाफ लगातार नई शिकायतें दर्ज कराई जा रही हैं। इस पर नाराजगी व्यक्त करते हुए जस्टिस ने कहा, "बस बहुत हो गया, मैं 4 मई से यही सुनता आ रहा हूं। अब मैं उसी आदेश के आधार पर फैसला सुनाने जा रहा हूं, जो सुवेंदु अधिकारी के मामले में एक कोऑर्डिनेट बेंच ने दिया था।"
बिना जांच और साक्ष्य के आरोपों से जोड़ने पर सवाल
यह मामला क्लिनिकल प्रैक्टिस और नकली दवाओं से संबंधित एक शिकायत पर दर्ज FIR से जुड़ा था, जिसमें अभिषेक बनर्जी का नाम भी शामिल किया गया। बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन अदालत में पेश हुए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने शिकायत की प्रकृति और मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि बिना किसी शुरुआती जांच के और बिना यह साबित किए कि याचिकाकर्ता की इसमें कोई भूमिका है, किसी व्यक्ति को सीधे आपराधिक कृत्य से कैसे जोड़ा जा सकता है।
अदालत ने कहा:
"मैंने व्यक्तिगत रूप से तीन शिकायतें देखी हैं। इनमें से किसी का भी सीधे तौर पर याचिकाकर्ता (अभिषेक बनर्जी) से कोई संबंध नजर नहीं आता। पुलिस अपनी जांच जारी रख सकती है, लेकिन इस स्तर पर हिरासत में लेकर पूछताछ करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आप जांच पूरी करें और चार्जशीट दाखिल करें।"
‘चुनाव में दो बार हारने वाला व्यक्ति ही दर्ज करा रहा शिकायतें’
राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) ने तर्क दिया कि मामला जनस्वास्थ्य और फर्जी दवाओं से जुड़ा है तथा शिकायतकर्ता ने सच सामने लाने वाले के रूप में यह कदम उठाया। इस पर अदालत ने तीखा सवाल करते हुए पूछा कि यदि शिकायतकर्ता के पास इतनी महत्वपूर्ण जानकारी थी, तो उसने एक साल पहले शिकायत क्यों नहीं दर्ज कराई?
अदालत ने घटनाक्रम के राजनीतिक पहलू को रेखांकित करते हुए कहा कि शिकायत दर्ज कराने वाला व्यक्ति वही है जो अभिषेक बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ चुका है और दो बार पराजित भी हो चुका है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जो व्यक्ति लगातार चुनाव हार रहा है, वही बार-बार शिकायतें दर्ज करा रहा है।
हालांकि, राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि भले ही कथित कृत्य सीधे तौर पर बनर्जी द्वारा न किए गए हों, लेकिन जांच के दौरान उनके मातहतों (subordinates) के जरिए उनकी संलिप्तता के साक्ष्य मिल सकते हैं।
30 नवंबर तक दंडात्मक कार्रवाई पर रोक
तमाम दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने स्पष्ट किया कि वह पुलिस की जांच प्रक्रिया पर रोक नहीं लगा रही है, लेकिन वर्तमान साक्ष्यों और शिकायतों के आधार पर कोई भी कठोर कार्रवाई करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने पुलिस को निर्देशित किया कि वे जांच जारी रखें, किंतु 30 नवंबर तक अभिषेक बनर्जी के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कदम न उठाया जाए।





