नई दिल्ली: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में बड़ा बदलाव किया गया है। नए आदेश के तहत जिन राज्यों में स्पेशल समरी रिवीजन (SIR) प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां आवेदकों को वोटर लिस्ट में दोबारा नाम जुड़वाने के लिए 2003 की मतदाता सूची में अपने माता-पिता या दादा-दादी के नाम होने का विवरण नहीं देना होगा। अब आवेदकों को केवल नियमित फॉर्म-6 जमा करना होगा।
राहुल गांधी और कांग्रेस का जोरदार हमला चुनाव आयोग के इस फैसले पर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने सोशल मीडिया के जरिए कड़ा विरोध जताया है और इसे 'गैरकानूनी बदलाव' करार दिया है:
- टीसीएस पर सवाल: राहुल गांधी ने पूछा, "चुनाव आयोग में किसने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) को यह बदलाव करने का आदेश दिया? टीसीएस में किसने इस पर हस्ताक्षर किए? क्या उन पर कोई दबाव डाला गया था?"
- युवा मतदाताओं को हटाने का आरोप: कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने दावा किया कि जुलाई 2026 के मध्य में मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा यह बदलाव असंवैधानिक तरीके से कराया गया, ताकि 'जेन-जी' (Gen-Z) के युवाओं को मतदाता सूची से बाहर किया जा सके। उन्होंने इसके पीछे 'पीएम-एचएम की जोड़ी' का हाथ होने का आरोप लगाया।
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विपक्ष का 'लोकतंत्र बचाओ मार्च' यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब विपक्षी 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन ने सभी जिलों में 'लोकतंत्र बचाओ मार्च' शुरू करने का निर्णय लिया है। विपक्ष की प्रमुख मांगें हैं:
- भविष्य के सभी चुनाव बैलेट पेपर से कराए जाएं।
- सुप्रीम कोर्ट एसआईआर से जुड़े मामलों पर जल्द सुनवाई करे।
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चुनाव आयुक्तों की आपत्ति पर आयोग की सफाई यह विवाद 'द इंडियन एक्सप्रेस' की उस रिपोर्ट के बाद गहराया, जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में एसआईआर फैसलों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर अपनी असहमति और आपत्ति दर्ज कराई थी।
आयुक्तों का कहना था कि ये फैसले उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए। इसके जवाब में चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग मत होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। आयोग के सभी आदेश वैधानिक प्रक्रियाओं के तहत लिए गए हैं और उन्हें पूर्ण कानूनी मान्यता प्राप्त है।
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