संपादक की कलम से





जनता की आवाज न दबे





सुमन कुमार





रांची।झारखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र के पहले दिन सोमवार को सदन में शोक प्रकाश के दौरान विपक्ष के हंगामे से एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि क्या इस बार भी जनता के मुद्दे धरे के धरे रह जाएंगे।सदन में हंगामे और शोर-शराबे से यह संकेत मिल रहा है कि इस बार भी सदन में जन मुद्दों पर चर्चा बाधित होगी।साहिबगंज में एक पहाड़ियां युवती की निर्मम हत्या की घटना को लेकर विपक्षी सदस्य हत्यारों को फांसी की सजा देने की मांग करते हुए हाथों में तख्तियां लेकर वेल में आ गए।वैसे तो शीतकालीन सत्र के हंगामेदार होने के आसार पूर्व से ही दिख रहे थे,लेकिन साहिबगंज में पहाड़िया लड़की की हत्या की घटना से विपक्ष को एक और मुद्दा मिल गया।





सोमवार को सदन में शोक प्रकाश के दौरान सत्ता और विपक्ष के बीच नोक-झोंक और हंगामा लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।जनप्रतिनिधियों को यह समझने की आवश्यकता है कि सदन में हंगामे के बीच आम लोगों के मुद्दे हर बार गौण हो जाते हैं। जो विधायक जनता से उनके मुद्दे को विधानसभा में उठाने का वादा कर पहुंचते हैं,उन्हें कम ही समय मौका मिलता है कि सदन में जनता के सवाल उठा सकें। यदि अवसर मिलता भी है तो हंगामे के बीच में उनकी आवाज दब जाती है।विधायकों के लिए सदन में सबसे महत्वपूर्ण समय प्रश्नकाल का होता है,लेकिन इसका भी हंगामे की भेंट चढ़ जाना निराशाजनक एवं दुर्भाग्यपूर्ण है।





इसमें कोई दो राय नहीं है जनमुद्दे को सदन में उठाना विपक्ष का अधिकार है,लेकिन जनता के सवालों को हंगामे के बगैर भी सदन में उठाया जा सकता है। इस दिशा में सकारात्मक पहल हो तो जनता के हर मुद्दे को सही अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है, लेकिन झारखंड विधानसभा के पिछले कुछ सत्रों पर गौर करें तो जिन मुद्दों पर हंगामा हुआ या सदन हंगामे की भेंट चढ़ गई, उनको किसी अंजाम तक पहुंचाया नहीं जा सका। इस बार फिर शीतकालीन सत्र में जिन मुद्दों पर हंगामा होने के आसार दिख रहे हैं। उनमें नियोजन नीति प्रमुख है। इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार के मामले पर भी सदन में हंगामे के आसार दिख रहे हैं।विधानसभा के सत्र में हंगामे के बीच अक्सर जनता की आवाज दब जाती है। इस संबंध में सत्तापक्ष और विपक्ष के सभी विधायकों को गहन चिंतन मनन करने की आवश्यकता है। अपनी जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन करते हुए जनता के सवालों के प्रति गंभीर रहें, तभी लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा संभव है।





सोमवार को भाजपा के एक विधायक द्वारा सदन में अमर्यादित आचरण किया जाना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। संसद और विधानमंडल सर्वोच्च पंचायत माना जाता है। पहले सदन में मधुर वचन बोलने की प्रतिस्पर्धा थी, लेकिन अब परिदृश्य बदल गया है। जनप्रतिनिधियों द्वारा शब्दों के प्रयोग में शालीनता और संयम का अभाव स्पष्ट झलकता है।सदन में परस्पर तू-तू, मैं-मैं के दृश्य दिखाई दिए।





विधायिका सार्वजनिक बहसों को उच्चस्तरीय व प्रेरक बनाने का एक मंच होता है। विधायकों को चाहिए कि तेजस्वी वाणी भी मधुरता के साथ बोलें। सदन में व्यक्तिगत आक्षेप, उत्तेजक शब्दों का प्रयोग कतई उचित नहीं कहा जा सकता। माननीयों से आशा की जाती है कि सार्वजनिक बहसों को शालीन बनाने की दिशा में प्रयत्नशील रहें। उच्चस्तरीय सार्वजनिक बहसें आदर्श लोकमत बनाती हैं।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर किसी को है,लेकिन मर्यादा और संयम के साथ की जानी चाहिए। जनमुद्दों पर सदन में चर्चा और बहस के गिरते स्तर से राजनीतिक दलों के बीच घृणा का भाव भी बढ़ रहा है। सम्मानजनक अभिव्यक्ति के माध्यम से भी असहमति प्रकट किया जा सकता है।जिस प्रकार झारखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान सोमवार को पहले दिन जो परिस्थितियां उभरीं, उससे कई सवाल खड़े हो रहे हैं। इससे खराब बात और कुछ नहीं हो सकती कि राजनीतिक दल दलगत राजनीति के शिकार होकर सदन में अमर्यादित आचरण करें। उचित यह होगा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष में संवाद और बहस का स्तर ऊंचा हो। तभी लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा संभव है।