पणजी:

वर्ष 2013 के बहुचर्चित यौन उत्पीड़न मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा पीठ ने एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने 'तहलका' पत्रिका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को दोषी ठहराते हुए 10 साल की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने मापुसा (Mapusa) की सेशंस कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था।

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट के सख्त निर्देशों के तहत तरुण तेजपाल खुद अदालत में मौजूद थे, जब जस्टिस डॉक्टर नीला गोखले और जस्टिस अमित जमसंडेकर की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया।

"ट्रायल कोर्ट ने तेजपाल का नहीं, पीड़िता का ट्रायल किया"

गोवा सरकार और सीआईडी (CID) की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता तथा एडवोकेट जनरल देविदास पंगम ने सेशंस कोर्ट के फैसले के खिलाफ मजबूत तर्क रखे। राज्य सरकार की दलील थी कि निचली अदालत ने आरोपी के खिलाफ सही ढंग से मुकदमा चलाने के बजाय पूरे ट्रायल के दौरान 'पीड़िता के आचरण और उसके बैकग्राउंड' की ही जांच की।

अदालत में दी गई मुख्य दलीलें:
  • सबूतों की अनदेखी: सेशंस कोर्ट ने मामले के ठोस सबूतों, जैसे कि घटना के बाद तरुण तेजपाल द्वारा पीड़िता को भेजा गया 'माफीनामा ईमेल', को पूरी तरह से नजरअंदाज किया।
  • पीड़िता पर केंद्रित जांच: आरोपी के अपराध को आंकने के बजाय ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के 'घटना के बाद के व्यवहार' और प्रतिक्रियाओं को कटघरे में खड़ा किया, जो न्याय के सिद्धांतों के विपरीत था।

होटल की लिफ्ट में यौन उत्पीड़न का मामला

यह पूरा मामला नवंबर 2013 का है, जब गोवा के एक फाइव स्टार होटल में तहलका पत्रिका द्वारा एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस दौरान तरुण तेजपाल पर अपनी ही एक जूनियर महिला सहकर्मी के साथ होटल की लिफ्ट में यौन उत्पीड़न (Sexually Assaulting) करने का आरोप लगा था।

पीड़िता ने जब संस्थान की तत्कालीन मैनेजिंग एडिटर से लिखित शिकायत की, तब तेजपाल ने ईमेल के जरिए माफी मांगी थी। हालांकि, बाद में कानूनी लड़ाई के दौरान वे खुद को निर्दोष बताते रहे।

हाई कोर्ट द्वारा निचली अदालत का फैसला पलटे जाने और 10 साल की सजा सुनाए जाने के बाद इस बहुचर्चित मामले में पीड़िता को एक दशक से अधिक समय बाद अंततः न्याय मिला है।