नई दिल्ली। दिल्ली में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर उपजे भारी विवाद के बीच मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। याचिकाकर्ता अंजलि भारद्वाज की ओर से दायर याचिका पर मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी भी पात्र नागरिक का नाम वोटर लिस्ट से कटने नहीं दिया जाएगा। आयोग ने अदालत को भरोसा दिलाया कि जारी किए गए एक-एक नोटिस का बारीकी से भौतिक और दस्तावेजी सत्यापन किया जा रहा है।
चुनाव आयोग का पक्ष: 15,200 अधिकारियों का अमला तैनात
चुनाव आयोग ने अदालत के समक्ष अपनी कार्ययोजना रखते हुए बताया कि दिल्ली में एसआईआर प्रक्रिया और नोटिस निस्तारण के लिए प्रशासनिक अमले को व्यापक स्तर पर तैनात किया गया है:
- 1,200 इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (ERO): नोटिस की समीक्षा और अंतिम सेटलमेंट के लिए एसडीएम स्तर के 1,200 अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है।
- 14,000 बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO): घर-घर जाकर सत्यापन और नागरिकों के दस्तावेज जमा करने के लिए 14,000 बीएलओ तैनात किए गए हैं।
- समय सीमा (Deadline): आयोग ने बताया कि दस्तावेज प्रस्तुत करने की मौजूदा समय सीमा 31 अक्टूबर तक तय की गई है, और यदि आवश्यकता पड़ी तो इसे आगे भी बढ़ाया जाएगा।
याचिकाकर्ता के तर्क: यांत्रिक नोटिस और व्यावहारिक परेशानियां
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कोर्ट में याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए:
- भाषा और तार्किक विसंगतियां: भूषण ने कहा कि अंग्रेजी न जानने वाले लोगों को भी अंग्रेजी में नोटिस भेजे जा रहे हैं। तार्किक विसंगतियों (Logical Discrepancies) के नाम पर 19 लाख से ज्यादा लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं, जिनमें से कई में कोई स्पष्ट कारण दर्ज नहीं है।
- अजीबोगरीब विसंगतियां: ऐसे नोटिस जारी किए जा रहे हैं जहां माता-पिता और बच्चे की उम्र में 15 साल से कम का अंतर दिखाया गया है। याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया कि इसमें नागरिक की क्या गलती है और वह इसका प्रमाण कहां से लाएगा?
- दस्तावेजों की बाध्यता: आयोग द्वारा केवल 12 तय दस्तावेजों की मांग पर भूषण ने आपत्ति जताई। इसके जवाब में चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि 12 मुख्य दस्तावेजों के अलावा भी प्रासंगिक कागजात स्वीकार किए जा रहे हैं।
- हाई प्रोफाइल हस्तियां प्रभावित: लाल कृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल जैसे दिग्गजों को भी नोटिस मिले हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: 'प्रक्रिया को आसान बनाएं, कम्प्यूटरीकृत त्रुटियां सुधारें'
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि नोटिस स्वचालित (Computer-Generated) तरीके से भेजे गए हैं, जिन्हें सुधारा जाना चाहिए।
पीठ ने चुनाव आयोग को निर्देश दिए:
"हर वार्ड में बीएलओ को बैठाया जाए ताकि आम जनता को भटकना न पड़े। अधिकारी नागरिकों को सरल भाषा में समझाएं कि उन्हें किस विसंगति को दूर करने के लिए कौन-सा दस्तावेज चाहिए। यह सुनिश्चित करें कि किसी भी नागरिक या दैनिक वेतनभोगी को बार-बार चक्कर न लगाने पड़ें।"
क्या है पूरा विवाद?
| विषय | आंकड़े / विवरण |
| दिल्ली के कुल मतदाता (2025) | लगभग 1.5 करोड़ |
| ड्राफ्ट लिस्ट में हटाए/प्रभावित नाम | करीब 47 लाख नाम |
| जारी किए गए कुल नोटिस | 33.12 लाख मतदाता |
| तार्किक विसंगति श्रेणी | ~19 लाख मामले |
| 2002 सूची से अन-मैप्ड | ~13 लाख मामले |
आगे की प्रक्रिया और अपील व्यवस्था
नोटिस प्राप्त होने के बाद मतदाताओं को बीएलओ के पास अपने दस्तावेज जमा कराने होंगे। बीएलओ द्वारा सत्यापन के बाद यदि नाम काटा जाता है, तो नागरिक अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष अपना पक्ष रख सकते हैं। ट्रिब्यूनल से राहत न मिलने पर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने का कानूनी प्रावधान उपलब्ध रहेगा।





