नई दिल्ली:
दिल्ली की डीटीसी (DTC) और क्लस्टर बसों में महिलाओं के लिए मुफ्त सफर की व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया गया है। अब दिल्ली की महिला और ट्रांसजेंडर यात्रियों को मुफ्त यात्रा का लाभ उठाने के लिए 'पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड' (NCMC) का इस्तेमाल करना अनिवार्य होगा। जिन यात्रियों के पास यह कार्ड नहीं होगा, उन्हें सामान्य यात्रियों की तरह पूरा किराया देकर टिकट खरीदना पड़ेगा। यह व्यवस्था एसी (AC) और नॉन-एसी दोनों प्रकार की बसों पर समान रूप से लागू होगी।
नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड (NCMC) पर आधारित यह पिंक सहेली कार्ड इसी साल मार्च में लॉन्च किया गया था, जिसने पहले चलने वाले कागजी पिंक टिकटों का स्थान लिया है। परिवहन विभाग ने 30 सितंबर तक कार्ड बनवाने की समयसीमा तय की थी। अब तक करीब 19 लाख महिलाएं यह कार्ड बनवा चुकी हैं।
आसान और पारदर्शी व्यवस्था का दावा
परिवहन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, पिंक सहेली कार्ड को अनिवार्य करने का मुख्य उद्देश्य बस यात्रा की व्यवस्था को अधिक सुव्यवस्थित, आसान और पारदर्शी बनाना है।
- जागरूकता अभियान: समयसीमा समाप्त होने के बावजूद कई यात्रियों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। इसे देखते हुए सरकार बसों, डिपो, सोशल मीडिया और समाचार पत्रों के माध्यम से जागरूकता अभियान चला रही है।
- ट्रांसजेंडर यात्रियों को भी लाभ: यह सुविधा महिला यात्रियों के साथ-साथ ट्रांसजेंडर समुदाय के यात्रियों के लिए भी लागू की गई है।
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कार्ड बनवाने के लिए डिपो पर भारी भीड़, घंटों इंतजार
नियम सख्त होने के साथ ही दिल्ली के विभिन्न बस डिपो पर कार्ड बनवाने के लिए महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। शाहदरा और हसनपुर बस डिपो जैसे केंद्रों से व्यवस्था की बदहाली और लंबी कतारों की तस्वीरें सामने आ रही हैं:
- घंटों का इंतजार: कई महिलाएं सुबह 6 बजे से ही लाइनों में लग रही हैं, लेकिन 4-5 घंटे बीत जाने के बाद भी उनकी बारी नहीं आ रही है।
- सीमित क्षमता से परेशानी: हसनपुर डिपो पर सैकड़ों मीटर लंबी लाइनें देखी गईं। दोपहर 2 बजे तक 250 महिलाओं को टोकन दिए गए, लेकिन धीमी प्रक्रिया के कारण केवल 100 महिलाओं के ही कार्ड बन सके।
- बुजुर्गों और बच्चों के साथ आई महिलाएं परेशान: लाइन में खड़ी महिलाओं ने शिकायत की कि उन्हें लगातार दूसरे दिन आकर घंटों इंतजार करना पड़ रहा है, जिससे उन्हें और उनके साथ आए बच्चों व बुजुर्गों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
सीमित प्रोसेसिंग काउंटर और कार्ड बनाने की धीमी रफ्तार ने व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके चलते विभाग पर केंद्रों की संख्या और कार्यक्षमता बढ़ाने का दबाव बढ़ रहा है।
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