रांची: झारखंड के लिए थ्रो बॉल और वॉलीबॉल में दो स्वर्ण (गोल्ड) सहित कुल पांच मेडल जीतने वाली राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी सुनीता उरांव आज सिस्टम की बेरुखी के कारण अत्यंत दयनीय स्थिति में जीवन यापन करने को मजबूर हैं। जिस खिलाड़ी को खेल के मैदान में देश और राज्य का मान बढ़ाना चाहिए था, वह पिछले आठ-नौ सालों से रांची के मोराबादी स्थित खेल और युवा मामलों के निदेशालय परिसर में झाड़ू-पोछा लगाने का काम कर रही हैं।

मीडिया से बातचीत के दौरान अपनी आपबीती बताते हुए सुनीता का गला रुंध गया। उन्होंने बेहद भावुक होकर राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से सम्मानित पक्की नौकरी देने की अपील की है।

'झाड़ू-पोछा लगाना अच्छा नहीं लगता, लेकिन पेट की मजबूरी है'

सुनीता उरांव रोजाना 8 घंटे खेल निदेशालय में सफाई का काम करती हैं, जिसके बदले उन्हें महज ₹10,000 प्रति महीने का मेहनताना दिया जाता है।

  • वेतन में देरी: दर्द बयां करते हुए सुनीता ने कहा कि उन्हें कई-कई महीनों तक यह मामूली राशि भी नहीं मिलती, जिससे दैनिक जीवन चलाना मुश्किल हो जाता है।
  • कमरे का किराया और जरूरतें: किराए के मकान में रहने वाली सुनीता का पूरा वेतन कमरे के किराए और राशन-पानी में ही खत्म हो जाता है।
सुनीता उरांव का दर्द:
"मुझे झाड़ू-पोछा लगाना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता, लेकिन अगर यह काम नहीं करूंगी तो खाऊंगी क्या? हम किराए पर रहते हैं और हर महीने रेंट देना पड़ता है। मैं अपनी मेहनत से आगे बढ़ना चाहती हूं और सम्मानजनक जीवन जीना चाहती हूं।"

राष्ट्रीय स्तर पर चमक चुकी हैं सुनीता

सुनीता उरांव थ्रो बॉल और वॉलीबॉल की बेहतरीन खिलाड़ी रही हैं:

  • उपलब्धियां: उन्होंने झारखंड का प्रतिनिधित्व करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर दो गोल्ड मेडल और एक सिल्वर मेडल समेत कई पदक जीते हैं।
  • प्रदर्शन: उन्होंने तमिलनाडु और राजस्थान में आयोजित राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में झारखंड की टीम का नेतृत्व किया और जीत हासिल की।

पारिवारिक स्थिति भी बेहद खस्ताहाल

मूल रूप से बिजुपाड़ा की रहने वाली सुनीता के सिर से माता-पिता का साया उठ चुका है।

  • वह अपने भाई और भाभी के साथ रहती हैं।
  • परिवार में दो भाई और दो बहनें हैं। उनका भाई ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करता है, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है और वे एक-दूसरे की वित्तीय मदद करने में असमर्थ हैं।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से पक्की नौकरी की गुहार

अपने खेल और उपलब्धियों की अनदेखी से आहत सुनीता ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से गुहार लगाई है कि उन्हें खेल विभाग या किसी अन्य सरकारी विभाग में उनकी योग्यताओं के अनुसार पक्की और सम्मानजनक नौकरी दी जाए, ताकि उन्हें और उनके परिवार को इस आर्थिक तंगी से मुक्ति मिल सके।