नई दिल्ली/बैंकॉक: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारत और चीन के बीच व्यापारिक असंतुलन और ड्रैगन की नीतियों पर तीखी चिंता व्यक्त की है। बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की बैठक के दौरान 'अटलांटिक काउंसिल' के साथ बातचीत करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन की ओर से लगाई जाने वाली गैर-टैरिफ पाबंदियां (Non-Tariff Barriers) दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ाने में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई हैं।
व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर के पार
वित्त मंत्री ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगातार चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है और इस साल यह 100 अरब डॉलर से भी अधिक हो चुका है। सीतारमण के मुताबिक, चीन भारतीय उत्पादों को अपने बाजार में पर्याप्त पहुंच या जगह नहीं दे रहा है, जिसके कारण भारतीय कंपनियों को वहां व्यापार करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
कड़े नियमों और पाबंदियों का उदाहरण
चीन की व्यापारिक नीतियों की आलोचना करते हुए वित्त मंत्री ने फाइटोसेनेटरी (पौधों और फसलों को कीटों व बीमारियों से बचाने वाले) नियमों का विशेष उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि:
- जेनेरिक दवाओं, मांस और ताजी सब्जियों जैसे भारतीय उत्पादों के लिए चीन के बाजार में अपार संभावनाएं हैं।
- लेकिन, जटिल और कड़े नियमों के आड़े आने के कारण भारतीय निर्यातकों को वहां अपने उत्पाद बेचने के पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।
- उन्होंने यह भी साफ किया कि इन सबके बावजूद भारत ने चीन के सामान पर किसी तरह की जवाबी गैर-टैरिफ पाबंदियां या अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अनुचित रास्ता नहीं अपनाया है।
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कूटनीतिक रिश्ते सुधरे, पर व्यापारिक मुश्किलें बरकरार
यह बयान ऐसे समय में आया है जब हाल ही में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी यह बात उठाई थी कि चीन में भारतीय कारोबारियों को समान अवसर (Level Playing Field) नहीं मिल रहे हैं। हालांकि, साल 2020 की सीमा झड़पों के बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्तों को सामान्य बनाने के प्रयास जारी हैं और पीएम मोदी तथा राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी संबंधों को स्थिर करने की दिशा में काम कर रहे हैं, लेकिन व्यापार मोर्चे पर गतिरोध अब भी कायम है।
ASEAN समझौतों और आर्थिक चुनौतियों पर भी बात
इसके साथ ही, वित्त मंत्री ने दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन (ASEAN) के साथ हुए भारत के व्यापार समझौतों की शर्तों पर भी पुनर्विचार करने की बात कही। उन्होंने कहा कि मौजूदा शर्तें भारत के पक्ष में पूरी तरह संतुलित नहीं हैं, इसलिए व्यापार असंतुलन को पाटने के लिए इनमें बदलाव जरूरी है। इसके अलावा, कच्चे तेल और उर्वरकों के आयात पर भारी निर्भरता तथा विदेशी पूंजी की निकासी के कारण भारतीय रुपये पर बन रहे दबाव का भी उन्होंने जिक्र किया।
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