सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की मतदाता सूची से मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जाने के मामले पर कड़ा संज्ञान लिया है। सर्वोच्च अदालत ने उन मतदाताओं को भरोसा दिलाया है कि वह 28 अक्टूबर को इस गंभीर समस्या पर विचार करेगी, जिनकी शिकायत थी कि उनके नाम मतदाता सूची से अवैध रूप से हटाए गए हैं।

शीर्ष अदालत ने यह आश्वासन तब दिया जब वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज की याचिका पर तत्काल सुनवाई की मांग की। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा, "हम एक ऐसा आदेश पारित करने पर विचार कर रहे हैं जिससे इस गड़बड़ी को ठीक किया जा सके।"

क्या है पूरा मामला और विवाद?

  • लाखों नाम हटे: 31 अगस्त को प्रकाशित दिल्ली की मतदाता सूची के मसौदे के अनुसार, एसआईआर (SIR) से पहले की कुल 1,45,10,299 मतदाताओं की संख्या में से 47,56,722 मतदाताओं के नाम अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लिकेट श्रेणियों के तहत हटा दिए गए हैं। इनमें से लगभग 32 लाख लोगों को स्थायी रूप से स्थानांतरित माना गया है।
  • फॉर्म-6 की विसंगति: वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट को बताया कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, उन्हें फिर से नाम जुड़वाने के लिए 'फॉर्म 6' भरने को कहा जा रहा है। समस्या यह है कि फॉर्म 6 में यह घोषणा करनी होती है कि आवेदक पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वा रहा है, जो कि मौजूदा और पुराने मतदाताओं के मामले में तथ्यात्मक रूप से गलत है।
  • वैकल्पिक सुझाव: याचिकाकर्ता की ओर से यह सुझाव दिया गया है कि चुनाव आयोग को यह निर्देश दिया जाए कि छूटे हुए मतदाता 'फॉर्म 8' या किसी अन्य उपयुक्त तरीके का उपयोग करके आवेदन कर सकें, ताकि वे खुद को पहली बार का वोटर बताए बिना अपना नाम वापस सूची में जुड़वा सकें।

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अगली सुनवाई और समय सीमा

चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के ड्राफ्ट में आपत्तियां और दावे दर्ज कराने की अंतिम तिथि 30 अक्टूबर तय की है। चूंकि समय बहुत कम बचा है, इसलिए प्रशांत भूषण ने मामले की तत्काल सुनवाई का आग्रह किया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट 28 अक्टूबर को इस याचिका पर सुनवाई करने के लिए राजी हो गया है।

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