पेरिस:
फ्रांस में छात्रों और शिक्षकों का आंदोलन अब बेहद उग्र रूप ले चुका है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सुरक्षा कारणों के मद्देनजर देश के करीब 500 हाई स्कूलों को पूरी तरह या आंशिक रूप से बंद कर दिया गया है। शिक्षा मंत्री एडुआर्ड गेफ्रे ने एहतियातन यह कदम उठाया है। सितंबर के मध्य से शुरू हुआ यह असंतोष अब फ्रांस के कई प्रमुख शहरों में फैल चुका है, जिससे राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार भारी दबाव में आ गई है।
कैसे शुरू हुआ आंदोलन?
इस व्यापक आंदोलन की शुरुआत 17 सितंबर को पेरिस के निकट स्थित क्रेतेइल के 'सेंट-एक्सुपरी हाई स्कूल' से हुई थी। शुरुआत में छात्र और शिक्षक केवल कर्मचारियों तथा बुनियादी संसाधनों की भारी कमी के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध जता रहे थे। हालांकि, देखते ही देखते यह आंदोलन पेरिस क्षेत्र से निकलकर मार्सिले, स्ट्रासबर्ग, टूर्स और लिले जैसे प्रमुख शहरों में फैल गया।
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हिंसा, तोड़फोड़ और गिरफ्तारियां
प्रदर्शनों के दौरान कई स्थानों पर हिंसक झड़पें, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं दर्ज की गई हैं:
- सुरक्षा बलों की कार्रवाई: प्रदर्शनकारियों द्वारा सड़कों और कूड़ेदानों में आग लगाए जाने के बाद पुलिस ने आंसू गैस और रबर की गोलियों का प्रयोग किया।
- नुकसान और चोटें: शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, 24 स्कूलों में तोड़फोड़ हुई है और 40 प्रिंसिपलों सहित कम से कम 65 शिक्षा कर्मचारी घायल हुए हैं।
- व्यापक गिरफ्तारियां: गृह मंत्रालय ने पुष्टि की है कि अब तक 4,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया या गिरफ्तार किया गया है।
छात्रों और शिक्षकों की मुख्य मांगें
- ओवरक्रॉउडिंग और स्टाफ की कमी: कई स्कूलों की कक्षाओं में 40-40 छात्र बैठने को मजबूर हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 30 का है। इसके अलावा, योग्य शिक्षकों, स्कूल नर्सों और सोशल वर्कर की भारी कमी है।
- पढ़ाई के घंटों का नुकसान: अप्रैल 2024 की एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, अनुपस्थित शिक्षकों की जगह दूसरे शिक्षक न मिलने के कारण सत्र 2024-2025 में 9.8% पढ़ाई के घंटे बर्बाद हुए।
- बुनियादी सुविधाओं का अभाव: अधिकतर सरकारी स्कूलों में AC नहीं हैं। हालिया हीटवेव में छात्रों को 35°C से 40°C तापमान में बंद कमरों में परीक्षाएं देनी पड़ीं।
- लंबा समय और भेदभाव: सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे तक का समय थकाऊ साबित हो रहा है। साथ ही, पिछड़े इलाकों के छात्रों ने आवासीय पते के आधार पर शैक्षिक भेदभाव का आरोप भी लगाया है।
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आंदोलन का राजनीतिकरण और सरकार के सामने चुनौतियां
आगामी चुनावों को देखते हुए इस आंदोलन ने राजनीतिक रूप भी ले लिया है। दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी नेताओं का आरोप है कि कट्टर वामपंथी पार्टी 'फ्रांस अनबोउड' (LFI) और उसके नेता जीन-ल्यूक मेलेंशॉन युवाओं को गोलबंद करने के लिए इस असंतोष को हवा दे रहे हैं। प्रदर्शनों में फिलिस्तीन और अल्जीरिया के झंडे देखे जाने से यह बहस और तेज हो गई है।
दूसरी ओर, मरीन ले पेन की पार्टी 'नेशनल रैली' के बढ़ते प्रभाव और वित्तीय बजट की सीमाओं ने मैक्रों सरकार के लिए स्थिति कठिन कर दी है। वर्ष 2027 के प्रस्तावित बजट में शिक्षा खर्च को 1.7% बढ़ाकर €65.53 बिलियन करने का प्रावधान है, जो मुद्रास्फीति दर से भी कम है। ऐसे में वित्तीय कटौती के लक्ष्यों के बीच असंतुष्ट छात्रों की मांगों को पूरा करना सरकार के लिए एक बड़ी परीक्षा बन गया है।
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