नई दिल्ली:

भारत में कर्ज लेने और क्रेडिट सिस्टम से जुड़ने के तरीके में बीते एक दशक (2016-2026) में एक बड़ा बुनियादी बदलाव आया है। ट्रांसयूनियन सिबिल (TransUnion CIBIL) और फाइनेंस इंडस्ट्री डेवलपमेंट काउंसिल (FIDC) की हालिया स्टडी के अनुसार, अब लोग पहली बार कर्ज (First Loan) किसी वाहन या खेती के लिए नहीं, बल्कि मोबाइल फोन, फ्रिज और वॉशिंग मशीन जैसे कंज्यूमर-ड्यूरेबल्स सामान खरीदने के लिए ले रहे हैं।

इस बदलते ट्रेंड में नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) की भूमिका सबसे अहम बनकर उभरी है। जून 2026 में खत्म हुई तिमाही तक न्यू-टू-क्रेडिट (NTC) ग्राहकों को दिए जाने वाले लोन में NBFCs की हिस्सेदारी बढ़कर 50% हो गई है, जो कि वर्ष 2016 की इसी अवधि में मात्र 24% थी।

10 साल में कैसे बदला पहली बार लोन (NTC) लेने का पैटर्न?

लोन का प्रकार2016 की हिस्सेदारी (H1)2026 की हिस्सेदारी (H1)
कंज्यूमर-ड्यूरेबल (फोन, फ्रिज आदि)6%30% (सबसे बड़ा माध्यम)
पर्सनल लोन-12%
गोल्ड लोन8%11%
टू-व्हीलर लोन10%10%
किसान क्रेडिट कार्ड (KCC)18% (2016 में सबसे बड़ा)अन्य में शामिल
एग्रीकल्चर लोन11%अन्य में शामिल
अन्य प्रोडक्ट्स47%37%

मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण

  • छोटे टिकट साइज की धूम (₹50,000 से कम के लोन):
  • कंज्यूमर-ड्यूरेबल लोन में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी छोटे लोन की है। जून 2026 तिमाही में 50,000 रुपये से कम के लोन की हिस्सेदारी 93% रही। जून 2019 की तुलना में ऐसे छोटे लोन की संख्या 2.6 गुना बढ़ गई है, जिससे स्पष्ट होता है कि क्रेडिट का दायरा रोजमर्रा के छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक फैल चुका है।
  • मोबाइल फोन फाइनेंसिंग बनी सबसे बड़ा जरिया:
  • ट्रांसयूनियन सिबिल के एमडी एवं सीईओ भावेश जैन के अनुसार, युवा (विशेषकर Gen-Z) क्रेडिट सिस्टम में सबसे पहले मोबाइल फोन खरीदने के लिए कदम रखते हैं। वर्ष 2026 की पहली छमाही में Gen-Z उधारकर्ताओं को मिले कुल क्रेडिट का लगभग 46% हिस्सा NBFCs से प्राप्त हुआ।
  • NBFCs का बढ़ता बाजार प्रभाव:
  • FIDC के सीईओ रमन अग्रवाल के अनुसार, NTC सेगमेंट में NBFCs की 50% हिस्सेदारी यह दर्शाती है कि वे लोगों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली (Formal Financial System) से जोड़ने में पुल का काम कर रहे हैं। इससे नए ग्राहकों को अपना पहला 'क्रेडिट स्कोर' बनाने में मदद मिल रही है।
    • संख्या के आधार पर NBFC की हिस्सेदारी: 2016 में 33% → 2026 में 43%
    • वैल्यू (रकम) के आधार पर हिस्सेदारी: 2016 में 22% → 2026 में 30%

क्या EMI का बढ़ता चलन कर्ज का जाल है?

आसानी से मिलने वाले कंज्यूमर-ड्यूरेबल लोन और 'नो-कॉस्ट EMI' के बढ़ते उपयोग ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या आम आदमी जरूरत से ज्यादा कर्ज के बोझ तले दब रहा है?

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल छोटे कंज्यूमर लोन और NTC सेगमेंट के बढ़ने से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि लोग वित्तीय संकट में फंस रहे हैं। महामारी के बाद डिजिटल कनेक्टिविटी के लिए स्मार्टफोन की बढ़ती अनिवार्यता और छोटे टिकट साइज के कारण यह बदलाव देखने को मिल रहा है। हालांकि, वित्तीय अनुशासन के बिना लगातार EMI पर सामान खरीदना भविष्य में वित्तीय दबाव जरूर पैदा कर सकता है।

#ConsumerCredit #IndianEconomy #NBFCS #NTC #FinancialInclusion #PersonalFinance #EMITrend #CIBILReport

#क्रेडिटमार्केट #एनबीएफसी #कंज्यूमरलोन #न्यूटूक्रेडिट #इएमआई #पर्सनलफाइनेंस #भारतीयअर्थव्यवस्था #ट्रांसयूनियनसिबिल