बिहार की राजधानी पटना में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित धांधली को लेकर छात्रों का प्रदर्शन उग्र रूप ले चुका है, लेकिन इस संकट के दौर में राज्य के प्रशासनिक तंत्र को लेकर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। एक तरफ हजारों युवा सड़कों पर उतरकर भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्य के तीन सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक और प्रशासनिक पदों पर बैठे शीर्ष अधिकारी एक साथ लंबी छुट्टी पर चले गए हैं।

एक साथ छुट्टी पर गए 3 शीर्ष अधिकारी और उनके स्थान पर नए प्रभारी

छात्र आंदोलनों के बीच डीजीपी समेत परीक्षा आयोगों के प्रमुखों का एक साथ अवकाश पर जाना प्रशासनिक गलियारों में चर्चा और विवाद का विषय बन गया है:

  • बिहार के डीजीपी (DGP): पुलिस महानिदेशक विनय कुमार 21 दिनों की लंबी छुट्टी पर चले गए हैं। उनकी अनुपस्थिति में 1991 बैच की वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी प्रीता वर्मा को राज्य का प्रभारी डीजीपी बनाया गया है।
  • BPSC अध्यक्ष: बिहार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष परमार रवि मनुभाई भी छुट्टी पर हैं। उनकी जगह वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हरजोत कौर को BPSC अध्यक्ष का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।
  • BPSSC अध्यक्ष: बिहार पुलिस अवर सेवा आयोग के अध्यक्ष के. एस. द्विवेदी के अवकाश पर जाने के बाद केंद्रीय चयन परिषद के अध्यक्ष व वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी जिलेन्द्र कुमार को BPSSC का प्रभार दिया गया है।

सड़कों पर संग्राम: सीएम आवास घेराव की कोशिश

बीपीएससी की 70वीं परीक्षा और बीपीएसएससी की सब-इंस्पेक्टर (1,799 पद) भर्ती परीक्षा को रद्द करने की मांग को लेकर मंगलवार को अभ्यर्थियों ने पटना के गांधी मैदान से मुख्यमंत्री आवास तक विरोध मार्च निकाला।

  • बैरिकेड्स तोड़े और पुलिस से झड़प: जेपी गोलंबर पर पुलिस द्वारा रोके जाने के बाद बारिश के बीच हाथों में तिरंगा लिए प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेडिंग तोड़ दी और वैकल्पिक रास्तों से आगे बढ़ने की कोशिश की।
  • रेलवे ट्रैक जाम करने का प्रयास: प्रदर्शन के दौरान कुछ अभ्यर्थियों ने रेल यातायात बाधित करने की भी कोशिश की, जिसके बाद पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया।

जांच और उठते सवाल

सिपाही और सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा में धांधली के आरोपों की जांच सरकार द्वारा आर्थिक अपराध इकाई (EOU) को सौंपी गई है। हालांकि, छात्र परीक्षाओं को पूरी तरह रद्द कर नए सिरे से आयोजित करने की मांग पर अड़े हैं।

ऐसे संवेदनशील समय में जब कानून-व्यवस्था और भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता दांव पर है, राज्य के पुलिस कप्तान और दोनों प्रमुख भर्ती बोर्डों के अध्यक्षों का एक साथ अनुपस्थित होना प्रशासनिक व्यवस्था और सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठा रहा है।