मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण मामले को लेकर हाई कोर्ट की विशेष युगलपीठ ने एक महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ की विशेष युगलपीठ ने ओबीसी आरक्षण को बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है।
इस निर्णय के साथ ही प्रदेश में ओबीसी के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था ही प्रभावी बनी रहेगी।
तीन महीने के भीतर अनारक्षित पदों पर नियुक्ति के निर्देश
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि भर्ती प्रक्रियाओं के दौरान रोके गए 13 प्रतिशत पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को तीन महीने के भीतर नियुक्तियां दी जाएं। इस कदम से लंबे समय से अटकी पड़ी सरकारी भर्तियों के रास्ते साफ होने की उम्मीद है।
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क्या था पूरा मामला?
- वर्ष 2019 का अध्यादेश: तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने वर्ष 2019 में एक अध्यादेश के माध्यम से ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया था।
- कानूनी चुनौती: इस निर्णय के खिलाफ हाई कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें मुख्य आधार आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन और ओबीसी वर्ग को अतिरिक्त आरक्षण देने के लिए पर्याप्त आंकड़ों की उपलब्धता का अभाव था।
- 87:13 का फार्मूला: इस कानूनी विवाद के चलते मध्य प्रदेश में 87:13 के फार्मूले के तहत भर्ती प्रक्रिया चलाई जा रही थी, जिसमें 87 प्रतिशत पदों पर नियुक्तियां हो रही थीं और शेष 13 प्रतिशत पद अंतिम फैसले के लिए रोके गए थे।
अब अदालत के इस फैसले से मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC), कर्मचारी चयन मंडल (ESB) और अन्य भर्ती एजेंसियों द्वारा आयोजित की जाने वाली लंबित चयन प्रक्रियाओं और नियुक्तियों पर सीधा असर पड़ेगा।





