लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो गई है। राज्य के दो प्रमुख विपक्षी दल, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा), 2017 के पुराने फॉर्मूले को एक बार फिर नए कलेवर में दोहराने की तैयारी में हैं। सूत्रों के मुताबिक, दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के बीच गठबंधन के बुनियादी ढांचे पर सैद्धांतिक सहमति बन चुकी है और सीट शेयरिंग का खाका लगभग तैयार है।

2017 का फॉर्मूला और सीटों का गणित

गठबंधन के इस नए खाके के तहत कांग्रेस को 105 से 115 सीटें मिलने की संभावना है। 2017 के चुनाव में कांग्रेस 114 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिसमें 105 पर उसके अपने उम्मीदवार थे और 9 सीटों पर सपा प्रत्याशी कांग्रेस के सिंबल पर मैदान में उतरे थे। इस बार भी यदि किसी सीट पर सपा उम्मीदवार का समीकरण मजबूत पाया जाता है, तो वह कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर ताल ठोक सकता है। हालांकि कांग्रेस ने अंदरूनी सर्वे के जरिए 150 मजबूत सीटें चिन्हित की हैं, लेकिन पार्टी व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए 2017 के आंकड़ों के आसपास टिकने को सहमत दिख रही है।

शीर्ष नेतृत्व का स्पष्ट संदेश

कांग्रेस ने संगठन सृजन अभियान के तहत राज्य में जिलाध्यक्षों के चयन को अंतिम रूप दे दिया है। प्रदेश अध्यक्ष अजय राय, प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम और नेता विधानमंडल दल की राष्ट्रीय नेतृत्व तथा पार्टी की वरिष्ठतम नेता सोनिया गांधी के साथ बैठक हो चुकी है। इस उच्चस्तरीय संवाद में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि सपा के साथ पूर्ण तालमेल बनाकर चुनाव मैदान में उतरना है। दूसरी ओर, सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी अपने कार्यकर्ताओं को कांग्रेस के साथ मजबूती से चुनाव लड़ने का संदेश दे चुके हैं।

मुख्य बिंदुविवरण
प्रस्तावित सीट शेयरिंगकांग्रेस को 105–115 सीटें
2017 का ऐतिहासिक आधार105 कांग्रेस प्रत्याशी + 9 कांग्रेस सिंबल पर सपा प्रत्याशी
तैयारीकांग्रेस ने सर्वे के आधार पर 150 सीटें चिन्हित कीं
शीर्ष समन्वयसोनिया गांधी और अखिलेश यादव की ओर से तालमेल का स्पष्ट संकेत

बदले राजनीतिक समीकरण और बिहार से सबक

सपा के स्थानीय नेता भले ही शुरुआत में कांग्रेस को 40-50 सीटों तक सीमित करने की बात कह रहे थे, लेकिन बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों ने तस्वीर बदल दी है। राष्ट्रीय स्तर पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा उठाए गए जनमुद्दों से विभिन्न वर्गों और भाजपा विरोधी मतदाताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता में इजाफा हुआ है।

इसके साथ ही, दोनों दलों ने बिहार में पिछले महागठबंधन के दौरान सीटों की खींचतान से हुए नुकसान से सबक लिया है। यही वजह है कि इस बार सीट शेयरिंग को लेकर किसी बड़े विवाद की आशंका नहीं है और ध्यान केवल जिताऊ प्रत्याशियों के चयन व जमीनी तालमेल पर केंद्रित किया जा रहा है।