लखनऊ/एटा। समाजवादी पार्टी (सपा) के शीर्ष नेतृत्व ने एटा और कासगंज जिलों के अपने संगठनात्मक ढांचे पर अब तक का सबसे बड़ा एक्शन लिया है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में हुई समीक्षा बैठक के दौरान नेताओं के बीच हुई तीखी बहस, गाली-गलौज और हाथापाई की नौबत के बाद सपा ने दोनों जिलों की पूरी जिला कार्यकारिणी और सभी फ्रंटल संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है।
सपा प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, जिलाध्यक्षों से लेकर ब्लॉक और बूथ स्तर के सभी पदाधिकारियों को पदमुक्त कर दिया गया है। 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस 'रीसेट' के पीछे सिर्फ बैठक में हुआ हंगामा ही नहीं, बल्कि एटा-कासगंज की दशकों पुरानी अंदरूनी गुटबाजी को मुख्य वजह माना जा रहा है।
लखनऊ की बैठक में क्या हुआ?
19 सितंबर को लखनऊ स्थित सपा प्रदेश मुख्यालय में 2027 चुनाव की तैयारियों और जमीनी स्थिति का जायजा लेने के लिए एटा और कासगंज के प्रमुख पदाधिकारियों की बैठक बुलाई गई थी।
बैठक के दौरान पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष जुगेंद्र सिंह यादव और पूर्व जिला पंचायत सदस्य मंजीत यादव के समर्थकों के बीच पुरानी रंजिश को लेकर तीखी बहस शुरू हो गई। देखते ही देखते अखिलेश यादव के सामने ही दोनों गुटों में जमकर गाली-गलौज होने लगी।
घटना से आक्रोशित होकर अखिलेश यादव ने जुगेंद्र यादव के परिवार के राजनीतिक-कारोबारी रसूख पर तंज कसते हुए कहा, "जब पैसा ज्यादा हो जाता है, तब लोग ऐसे ही करते हैं।" इसके बाद अखिलेश यादव बैठक बीच में ही छोड़कर चले गए और दोनों गुटों के नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
कौन हैं विवादों में घिरे जुगेंद्र सिंह यादव?
एटा की राजनीति में जुगेंद्र सिंह यादव और उनके परिवार का लंबे समय से दबदबा रहा है:
- राजनीतिक पृष्ठभूमि: जुगेंद्र सिंह यादव अलीगंज से सपा के पूर्व विधायक रहे रामेश्वर सिंह यादव के छोटे भाई हैं। जुगेंद्र खुद एटा के जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके हैं और वर्तमान में उनकी पत्नी रेखा यादव एटा की जिला पंचायत अध्यक्ष हैं।
- पारिवारिक रसूख: जुगेंद्र के बड़े भाई रामेश्वर यादव के बेटे सुबोध यादव (इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिवक्ता) भी राजनीति में सक्रिय हैं। परिवार पर आरोप लगता रहा है कि वे जिले में किसी अन्य सपा नेता को आगे नहीं बढ़ने देना चाहते।
- आर्थिक साम्राज्य: पेट्रोल पंप, होटल, स्कूल और ठेकेदारी के व्यवसाय से जुड़े जुगेंद्र यादव ने 2022 के चुनावी हलफनामे में अपनी संपत्ति 23 करोड़ रुपये घोषित की थी। उनके भाई रामेश्वर यादव ने भी अपनी संपत्ति 23 करोड़ रुपये ही दर्शाई थी।
विरोधी गुट: कौन हैं मंजीत यादव?
विवाद का दूसरा पक्ष मंजीत यादव का है:
- मंजीत यादव पूर्व विधान परिषद सभापति रमेश बाबू यादव के भतीजे हैं और एटा के वार्ड नंबर 9 से जिला पंचायत सदस्य रह चुके हैं।
- वह मारहरा विधानसभा सीट से सपा के टिकट के प्रबल दावेदार माने जाते हैं और संपत्ति/ठेकेदारी के कारोबार से जुड़े हैं।
- रमेश बाबू यादव के बेटे आशीष यादव 'आंसू' एटा सदर से सपा विधायक रह चुके हैं और वर्तमान में बीजेपी से एमएलसी हैं।
गुटबाजी का खामियाजा: 2 चुनाव से सपा पस्त
एटा और कासगंज कभी समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ (आलू बेल्ट) माने जाते थे। 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा ने यहां की 7 में से 6 सीटों पर जीत दर्ज की थी। हालांकि, जुगेंद्र परिवार बनाम अन्य स्थानीय नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई के चलते:
- 2017 चुनाव: सपा दोनों जिलों की सभी 7 सीटें हार गई।
- 2022 चुनाव: 7 में से 6 सीटों पर सपा को हार का सामना करना पड़ा (केवल पटियाली सीट जीत सकी)। 2022 में जुगेंद्र यादव और उनके भाई रामेश्वर यादव दोनों खुद भी चुनाव हार गए थे।
जुगेंद्र यादव की सफाई और भावी राह
विवाद और निष्कासन के बाद जुगेंद्र सिंह यादव ने बयान जारी कर स्थिति को संभालने की कोशिश की। उन्होंने कहा, "अखिलेश यादव मेरे बड़े भाई जैसे हैं, हमारा खून का रिश्ता है। वह हमारे नेता हैं और उन्हें डांटने का पूरा हक है।"
फिलहाल, 2027 चुनाव से पहले एटा और कासगंज में सपा के पास नए सिरे से संगठन खड़ा करने की बड़ी चुनौती है। अब देखना यह होगा कि अखिलेश यादव जुगेंद्र परिवार के प्रभुत्व को कम कर नए चेहरों पर दांव लगाते हैं या संतुलन बनाने की कोई नई रणनीति अपनाते हैं।





