तमिलनाडु के ऐतिहासिक और पौराणिक बंदरगाह शहर 'पूम्पुहार' को लेकर एक बेहद रोमांचक और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। शुरुआती चोल राजवंश द्वारा बसाया गया और सदियों पहले विनाशकारी सुनामी व समुद्री कटाव के कारण समंदर में समा चुका यह प्राचीन शहर एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों में है।

हाल ही में तमिलनाडु के पुरातत्व विभाग की एक विशेष टीम ने बंगाल की खाड़ी में समंदर के भीतर दो हफ्तों तक गहन खोजबीन (Underwater Exploration) की। इस अभियान के दौरान वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को ऐसे अनमोल ऐतिहासिक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जो पूम्पुहार के गौरवशाली इतिहास, समृद्ध अर्थव्यवस्था और सुदूर देशों के साथ व्यापारिक रिश्तों की पुख्ता गवाही देते हैं।

समंदर की गहराई में छिपे अमूल्य खजाने: क्या-क्या मिला?

तट से लगभग दो किलोमीटर दूर समंदर की गहराई में चलाए गए अभियान में 200 से अधिक प्राचीन मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े और कई जलमग्न संरचनाओं की स्पष्ट तस्वीरें सामने आई हैं।

  • टॉरपीडो जार (Torpedo Jars): खोज के दौरान विशेष प्रकार के लंबे और सकरे 'टॉरपीडो जार' मिले हैं। प्राचीन काल में फारस की खाड़ी (Persian Gulf) के व्यापारिक नेटवर्क में शराब, तेल और अन्य व्यापारिक सामानों के सुरक्षित परिवहन के लिए इन बर्तनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता था।
  • इरानी संबंध और ग्लेज्ड पॉटरी: समंदर की तलहटी से चिकनी और पॉलिश की हुई ग्लेज्ड पॉटरी प्राप्त हुई है, जो इस बात का सीधा प्रमाण है कि पूम्पुहार का सीधा व्यापारिक संबंध प्राचीन ईरान से था।
  • गंगा के मैदानों तक व्यापारिक पहुंच: अभियान में मिली पैडल-इम्प्रेस्ड पॉटरी से यह साबित होता है कि चोल साम्राज्य के इस बंदरगाह का व्यापारिक नेटवर्क भारत के अंदरूनी हिस्सों, विशेषकर गंगा के मैदानी इलाकों तक फैला हुआ था।
  • अमरावती के बौद्ध अवशेषों से जुड़ाव: शोधकर्ताओं को चूना पत्थर (Limestone) के अवशेष भी मिले हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इनका सीधा संबंध आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध 'अमरावती' के ऐतिहासिक बौद्ध अवशेषों और वास्तुकला से हो सकता है।

1991 की रहस्यमयी अंडाकार संरचना और प्राचीन साहित्यिक उल्लेख

पूम्पुहार का इतिहास कितना समृद्ध रहा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1991 में तट से करीब 5.5 किलोमीटर दूर, 23 मीटर की गहराई में एक विशालकाय संरचना खोजी गई थी।

यह 40 मीटर लंबी और 16 मीटर चौड़ी एक अंडाकार (Oval) संरचना है, जो समुद्र की तलहटी से लगभग 2.5 मीटर ऊपर उठी हुई है और विशालकाय पत्थर के ब्लॉकों से बनी है।

प्राचीन साहित्य और वैश्विक ग्रंथों में उल्लेख:

  • तमिल महाकाव्य: प्राचीन शहर पूम्पुहार (जिसे कावेरीपट्टिनम या कावेरीपूमपट्टिनम भी कहा जाता है) का विस्तृत और सजीव वर्णन तमिलनाडु के अमर महाकाव्यों 'सिलप्पतिकारम' और 'मणिमेगलाई' में मिलता है।
  • ग्रीक-रोमन दस्तावेज: प्राचीन ग्रीक और रोमन ऐतिहासिक व व्यापारिक दस्तावेजों में इस अंतर्राष्ट्रीय बंदरगाह का उल्लेख 'काबोरिस एम्पोरियम' (Kaboris Emporium) के नाम से किया गया है, जो इसके वैश्विक महत्व को दर्शाता है।

सुनामी का निवाला कैसे बनी चोल राजवंश की यह स्वर्णिम नगरी?

पुरातत्वविदों और भूवैज्ञानिकों के अनुसार, तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की यह बेहद विकसित और समृद्ध समुद्री नगरी किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से जलमग्न हुई थी। भयंकर सुनामी और लगातार होते समुद्री कटाव के कारण यह शहर धीरे-धीरे बंगाल की खाड़ी के आगोश में समाता चला गया।

समुद्र द्वारा इस शहर को निगले जाने का सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण वनागिरी का 'एल्लईअम्मन मंदिर' है। यह ऐतिहासिक मंदिर वर्ष 1991 तक स्थानीय लोगों द्वारा पूजा-अर्चना के लिए इस्तेमाल में था, लेकिन लगातार बढ़ते समुद्री स्तर और कटाव के कारण आज यह मंदिर तट से 100 मीटर अंदर समंदर के पानी में पूरी तरह डूब चुका है।

तमिलनाडु पुरातत्व विभाग की इस ताज़ा खोज ने न केवल चोल साम्राज्य की समुद्री ताक़त और उन्नत व्यापार व्यवस्था को दुनिया के सामने ला खड़ा किया है, बल्कि भारत के जलमग्न इतिहास को जानने की दिशा में एक नया अध्याय भी लिख दिया है।