संदीप कुमार
दिसंबर 1971 की वह सर्द रात भारतीय नौसेना के इतिहास में एक गहरे जख्म की तरह दर्ज है। गुजरात के तट से दूर, अरब सागर की लहरों के नीचे छिपी एक पाकिस्तानी पनडुब्बी 'पीएनएस हंगोर' ने भारतीय युद्धपोत 'आईएनएस खुकरी' पर घातक हमला किया था। चंद मिनटों में वह फ्रिगेट 18 अधिकारियों और 176 नाविकों के साथ समुद्र की अथाह गहराइयों में समा गया। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास का एकमात्र युद्धपोत है जिसे हमने दुश्मन के हमले में खोया। आज, साढे पांच दशकों के बाद 'हंगोर' नाम एक बार फिर भारतीय नौसेना के गलियारों में गूंज रहा है। लेकिन इस बार यह कोई पुरानी डीजल पनडुब्बी नहीं है, बल्कि चीन के सहयोग से निर्मित उन अत्याधुनिक पनडुब्बियों की पूरी खेप है, जिसे पाकिस्तान उस रफ्तार से अपनी सेना में शामिल कर रहा है जिसे भारत दशकों से हासिल नहीं कर पाया है।
'कल्ट करंट' के इस विशेष विश्लेषण में हम केवल रक्षा सौदों की संख्या पर बात नहीं करेंगे, बल्कि उस रणनीतिक सुस्ती और नौकरशाही के मकड़जाल की पड़ताल करेंगे जिसने हिंद महासागर के संतुलन को खतरे में डाल दिया है। भारत अब जाकर 'प्रोजेक्ट-75 इंडिया' (पी-75आई) के करीब पहुंच रहा है, जो छह पनडुब्बियों के निर्माण का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है। विडंबना देखिए कि इस परियोजना ने समुद्र में बिताए जाने वाले समय से कहीं अधिक वक्त फाइलों और वार्ताओं की मेजों पर गुजारा है।
पाकिस्तान की नई छलांग: चीन का हाथ और एआईपी की ताकत
30 अप्रैल 2026 को चीन के सान्या में एक भव्य समारोह हुआ। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की मौजूदगी में 'पीएनएस हंगोर' को पाकिस्तानी नौसेना में शामिल किया गया। यह एक नए युग की शुरुआत थी। यह पनडुब्बी स्वतंत्र वायु प्रणोदन (एआईपी) प्रणाली से लैस है। साधारण शब्दों में कहें तो यह तकनीक पनडुब्बी को हफ्तों तक पानी के भीतर रहने की शक्ति देती है क्योंकि उसे अपनी बैटरी रिचार्ज करने के लिए सतह पर आने या ऑक्सीजन के लिए स्नॉर्कलिंग करने की जरूरत नहीं पड़ती।
पाकिस्तान केवल एक पनडुब्बी पर नहीं रुक रहा है। वुहान के कारखाने में तीन और पनडुब्बियां— शुशुक, मंगरो और गाजी— पहले ही तैयार हो चुकी हैं। 2015 में हुए 5 अरब डॉलर के इस समझौते के तहत चार और पनडुब्बियां कराची में असेंबल की जाएंगी। 2028 तक पाकिस्तान के पास आठ ऐसी पनडुब्बियां होंगी जो एआईपी तकनीक से लैस होंगी। यह संख्या भारत की मौजूदा क्षमता को पीछे छोड़ने के लिए काफी है। केवल इतना ही नहीं, कमीशन होने के महज कुछ दिनों बाद पीएनएस हंगोर का मलेशिया के कोटा किनाबालु पहुंचना यह साबित करता है कि पाकिस्तान अब केवल अपने तटों की रक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहता। यह उसकी पहुंच और विस्तार का एक स्पष्ट संदेश है।
पूर्वी तट का सवाल: क्या विशाखापत्तनम अब सुरक्षित है?
भारतीय रक्षा विश्लेषकों के बीच एक आम धारणा रही है कि पाकिस्तान की नौसेना केवल पश्चिमी तट यानी अरब सागर तक सीमित है। लेकिन यह धारणा अब आत्मघाती साबित हो सकती है। पाकिस्तान की 'बाबर-3' मिसाइल, जो पनडुब्बी से छोड़ी जा सकती है और परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है, 450 किलोमीटर की मारक क्षमता रखती है। यदि पाकिस्तान की एक हंगोर श्रेणी की पनडुब्बी कराची से चलकर श्रीलंका के नीचे से होते हुए बंगाल की खाड़ी में प्रवेश करती है, तो वह भारत के पूर्वी तट पर स्थित महत्वपूर्ण ठिकानों, जैसे विशाखापत्तनम, को सीधे निशाने पर ले सकती है।
यद्यपि कुछ विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि इतनी दूर तक का सफर तय करना और पकड़े न जाना मुश्किल है, लेकिन युद्ध में क्षमता का होना ही अपने आप में एक बड़ा खतरा है। अंडमान निकोबार द्वीप समूह के पास या विशाखापत्तनम के प्रवेश द्वारों पर एक पाकिस्तानी पनडुब्बी की मौजूदगी मात्र ही भारतीय नौसेना की पूरी रणनीति को उलझाकर रख सकती है। भारत का एंटी-सबमरीन नेटवर्क कभी भी दो मोर्चों पर इस तरह के खतरे के लिए तैयार नहीं किया गया था।
प्रोजेक्ट-75 इंडिया: देरी की एक दुखद दास्तान
पी-75आई की कहानी भारतीय रक्षा खरीद की विफलता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी रूपरेखा 1999 में तय की गई थी। इसके तहत छह पनडुब्बियों का निर्माण होना था जो स्वदेशी तकनीक पर आधारित हों। लेकिन इस पर वास्तविक काम जुलाई 2021 में शुरू हुआ जब प्रस्ताव के लिए अनुरोध जारी किया गया। रूस, फ्रांस और स्पेन जैसे देश तकनीक हस्तांतरण की कठोर शर्तों के कारण इस दौड़ से बाहर हो गए। अंततः जर्मनी की कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स और भारत के मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड की जोड़ी एकमात्र दावेदार के रूप में उभरी।
इस साल के शुरू में ही करीब 70,000 से 90,000 करोड़ रुपये के इस सौदे पर बातचीत पूरी हुई है। जर्मनी के चांसलर की भारत यात्रा के दौरान एक अंतर-सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। लेकिन सवाल वही है— जो काम 1998 में शुरू होना चाहिए था, उसके लिए 2026 तक इंतजार क्यों करना पड़ा? पहली पनडुब्बी 2030 के दशक से पहले सेवा में नहीं आएगी। तब तक पाकिस्तान की नई पनडुब्बियां समुद्र में अपना प्रभुत्व जमा चुकी होंगी।
रणनीतिक संतुलन और ऊर्जा सुरक्षा का संकट
भारत के पास फिलहाल 19 पनडुब्बियां हैं, जिनमें तीन परमाणु संचालित हैं। यदि पी-75आई समय पर पूरा होता है, तो यह न केवल संख्या बढ़ाएगा बल्कि पुरानी होती 'सिंधुघोष' और 'शिशुमार' श्रेणी की पनडुब्बियों की जगह लेगा जो अपनी उम्र पूरी कर चुकी हैं। 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद चलाए गए 'ऑपरेशन सिंदूर' ने यह दिखा दिया था कि पनडुब्बियां कितनी महत्वपूर्ण हैं। तब भारतीय पनडुब्बियों ने पाकिस्तानी नौसेना को कराची बंदरगाह के भीतर ही कैद रहने पर मजबूर कर दिया था। लेकिन क्या हम हर बार अपनी पुरानी पनडुब्बियों से यह उम्मीद कर सकते हैं?
हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी एक और बड़ी चिंता है। चीन की पनडुब्बियां अब केवल सैद्धांतिक खतरा नहीं हैं, वे हकीकत हैं। भारत शायद संख्या के मामले में चीन की बराबरी न कर पाए, लेकिन पी-75आई के जरिए वह अपने घरेलू पानी में अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर एक मजबूत घेराबंदी कर सकता है। भारत की 88 प्रतिशत ऊर्जा जरूरतें समुद्र के रास्ते पूरी होती हैं। ऐसे में समुद्री रास्तों की सुरक्षा का अर्थ केवल सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि देश की आर्थिक जीवन रेखा को बचाए रखना है।
आत्मनिर्भरता: सिर्फ एक नारा या वास्तविकता?
पी-75आई अनुबंध की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी 'रणनीतिक साझेदारी' मॉडल है। इसके तहत पहली पनडुब्बी में 45 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री होगी, जो छठी पनडुब्बी तक बढ़कर 60 प्रतिशत हो जाएगी। जर्मनी की कंपनी को न केवल निर्माण बल्कि डिजाइन की बारीकियां भी भारत को सौंपनी होंगी। यह पिछली गलतियों को सुधारने का एक मौका है, क्योंकि स्कॉर्पीन कार्यक्रम में हम केवल असेंबली करना सीख पाए थे, डिजाइन करना नहीं।
पनडुब्बी निर्माण का बुनियादी ढांचा बनाने का लाभ केवल पारंपरिक पनडुब्बियों तक सीमित नहीं है। परमाणु पनडुब्बियों और पारंपरिक पनडुब्बियों के हाइड्रोलिक्स, अग्नि नियंत्रण प्रणाली और पतवार सामग्री में 60 से 70 प्रतिशत समानता होती है। इसलिए पी-75आई की सफलता भारत के अगले बड़े लक्ष्य 'प्रोजेक्ट-76' के लिए जमीन तैयार करेगी, जिसके तहत भारत पूरी तरह से स्वदेशी पनडुब्बियां डिजाइन करना चाहता है।
औद्योगिक प्रभाव: मझगांव डॉक से बोकारो तक
पनडुब्बी निर्माण का असर केवल मुंबई के बंदरगाहों तक सीमित नहीं रहता। स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने दो दशकों की मेहनत के बाद विशेष प्रकार का स्टील विकसित किया है जो समुद्र के खारे पानी और अत्यधिक दबाव को झेल सके। बोकारो और राउरकेला के संयंत्रों से निकलने वाला यह लोहा अब पनडुब्बियों की देह बनेगा। इसी तरह एक्साइड इंडस्ट्रीज ने स्वदेशी बैटरियां तैयार की हैं जो पनडुब्बी के कठिन वातावरण में काम कर सकें।
भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और कई निजी रक्षा कंपनियां भी सोनार सिस्टम और युद्ध प्रबंधन प्रणाली विकसित कर रही हैं। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उन छोटे और मध्यम उद्योगों की है जो सूक्ष्म पुर्जे औरprecision कंपोनेंट्स की आपूर्ति करते हैं। मझगांव डॉक के साथ जुड़े करीब 200 से अधिक ऐसे लघु उद्योग इस विशाल परियोजना के कारण अगले एक दशक तक फल-फूल सकेंगे। यह केवल एक रक्षा सौदा नहीं, बल्कि भारत के औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक ऑक्सीजन की तरह है।
वक्त हाथ से निकल रहा है
दक्षिण ब्लॉक के नीति निर्धारकों के लिए अब आत्ममुग्धता का समय नहीं है। हकीकत यह है कि जब भारत की पहली पी-75आई पनडुब्बी पानी में उतरेगी, तब तक पाकिस्तान के पास आठ अत्याधुनिक एआईपी पनडुब्बियां सक्रिय होंगी। चीन की पनडुब्बियों की संख्या तब तक और अधिक बढ़ चुकी होगी। हम निर्माण की घड़ी को पीछे नहीं मोड़ सकते, लेकिन हम उसे और धीमा होने से जरूर रोक सकते हैं।
भारत की पनडुब्बी शक्ति का इतिहास केवल निर्माण की क्षमता का नहीं रहा है। हमने 'अरिहंत' जैसी परमाणु पनडुब्बी बनाकर यह साबित किया है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो हम कुछ भी कर सकते हैं। लेकिन क्या वह इच्छाशक्ति एक निरंतर सांगठनिक आदत बन पाएगी?
प्रोजेक्ट-75 इंडिया अकेले उस खाई को नहीं भर पाएगा जो पाकिस्तान और चीन ने पैदा की है। लेकिन अगर इस पर तुरंत हस्ताक्षर किए जाएं, इसे समय पर बनाया जाए और इसे एक स्वतंत्र पनडुब्बी उद्योग की शुरुआत माना जाए, तो हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि भविष्य में जब भी भारतीय नौसेना के इतिहास में 'हंगोर' जैसे नाम का जिक्र हो, तो सन्नाटे का लाभ भारत के पास हो, न कि उसके शत्रुओं के पास। समुद्र की गहराइयों में जो चुप रहता है, वही विजेता होता है। अब यह भारत को तय करना है कि वह इस खामोश युद्ध में शिकारी बनेगा या शिकार।





