एपस्टीन फाइल: सत्ता की चुप्पी व लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा
संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा एपस्टीन फाइल का मुद्दा उठाया जाना कोई सनसनीखेज बयान नहीं, बल्कि सरकार की नैतिकता पर सीधा प्रहार था। इसके जवाब में मंत्री हरदीप सिंह पुरी की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने सवालों का समाधान करने के बजाय संदेह को और गहरा किया। सरकार आज जवाब देने की जगह बचाव की मुद्रा में दिखती है—और यही सबसे गंभीर संकेत है।
16 Feb 2026
|
30
संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा एपस्टीन फाइल का मुद्दा उठाया जाना कोई सनसनीखेज बयान नहीं, बल्कि सरकार की नैतिकता पर सीधा प्रहार था। इसके जवाब में मंत्री हरदीप सिंह पुरी की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने सवालों का समाधान करने के बजाय संदेह को और गहरा किया। सरकार आज जवाब देने की जगह बचाव की मुद्रा में दिखती है—और यही सबसे गंभीर संकेत है।
यह याद रखना जरूरी है कि एपस्टीन फाइल कोई विपक्षी कल्पना नहीं, बल्कि अमेरिका की न्यायिक एजेंसियों द्वारा सार्वजनिक किए गए आधिकारिक दस्तावेज़ हैं। जेफरी एपस्टीन 2008 में यौन अपराधों में दोषी ठहराया जा चुका था। इसके बावजूद, उसके साथ वर्षों बाद तक संवाद, आत्मीय भाषा और “हैव फन”, “एग्ज़ॉटिक आइलैंड” जैसे संदर्भ—क्या यह सब “पेशेवर संपर्क” की श्रेणी में आता है? विपक्ष का सवाल सीधा है - जब दुनिया भर में केवल संपर्क के आधार पर नेता पद छोड़ रहे हैं, तो भारत में जवाबदेही का मानक क्यों बदल जाता है?
सरकार की दलील है कि “मिलना अपराध नहीं।” विपक्ष भी यही मानता है। लेकिन सवाल मिलने का नहीं, मिलने के बाद की भाषा, संदर्भ और निरंतरता का है। नैतिकता ईमेलों की संख्या से नहीं, उनके आशय से तय होती है। एक भी संवाद अगर सत्ता की साख पर प्रश्न खड़ा करता है, तो उसका स्पष्ट, तथ्यपरक उत्तर देना सरकार का दायित्व है—न कि आलोचकों पर हमला।
इस पूरे प्रकरण में सरकार की सबसे चिंताजनक भूमिका सूचना-नियंत्रण की दिखाई देती है। विपक्षी ट्वीट्स पर आपत्ति, मीडिया को कथित “हिदायतें”, और सवालों से बचने की रणनीति—ये सब दर्शाते हैं कि सरकार को सच से कम, बहस से ज़्यादा डर है। यदि सब कुछ पारदर्शी है, तो खुली बहस से परहेज़ क्यों?
राहुल गांधी का यह सवाल भी वाजिब है कि एपस्टीन फाइल के सार्वजनिक होने और भारत–अमेरिका ट्रेड डील की घोषणाओं के समय का मेल संयोग है या दबाव का परिणाम। लोकतंत्र में संदेह पैदा होना अपराध नहीं, उसे दूर करना सरकार की जिम्मेदारी है।
आज असली प्रश्न विपक्ष के आरोप नहीं, सरकार की चुप्पी है। बहुमत नैतिकता का विकल्प नहीं हो सकता। एपस्टीन फाइल ने सत्ता को
आईना दिखाया है—अब तय सरकार को करना है कि वह जवाबदेह लोकतंत्र की कसौटी पर खड़ी होती है या सवालों से भागकर इतिहास में दर्ज होती है। n
ट्रेंडिंग
साइना नेहवालः जिद, युग, विरासत
16 Feb 2026 59
SHANTI: भविष्य का आधार
16 Feb 2026 70
आकाशीय संप्रभुताः SJ-100 बनेगा भारत का सारथी?
16 Feb 2026 49
आत्मनिर्भर भारत का 'रेयर अर्थ' संकल्प
16 Feb 2026 58
भारत-मलेशियाः नई कूटनीतिक धुरी
16 Feb 2026 38
संसद में टकराव, जवाबदेही पर सवाल
16 Feb 2026 37
पहचान का वनवास
16 Feb 2026 25
मराठा दुर्ग में 'आधुनिक पेशवा' का शंखनाद
16 Feb 2026 29
महाराष्ट्र का नया व्याकरणः ठाकरे विरासत का विसर्जन
16 Feb 2026 16
परिसीमन: ततैया का छत्ता
16 Feb 2026 42
डिजिटल रण और भारत का विवेक
16 Feb 2026 15
भारत-अमेरिका व्यापार समझौताः कूटनीतिक 'रीसेट'
16 Feb 2026 50
संक्रांति का शंखनाद, भारत-ईयू एफटीए
16 Feb 2026 34
केंद्रीय बजटः भविष्य का बजट, वर्तमान की चिंता
16 Feb 2026 26
बांग्लादेश: जनादेश पार कूटनीति के द्वार
16 Feb 2026 27