भारत-अमेरिका व्यापार समझौताः कूटनीतिक 'रीसेट'

2 फरवरी 2026 की वह शाम भारतीय विदेश मंत्रालय के गलियारों में एक तनावपूर्ण सन्नाटा लेकर आई थी। वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच पिछले एक साल से जारी कूटनीतिक गतिरोध और ‘छूटे हुए अवसरों’ की छाया इस आधे घंटे की टेलीफोनिक बातचीत पर मंडरा रही थी।

16 Feb 2026  |  52

2 फरवरी 2026 की वह शाम भारतीय विदेश मंत्रालय के गलियारों में एक तनावपूर्ण सन्नाटा लेकर आई थी। वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच पिछले एक साल से जारी कूटनीतिक गतिरोध और ‘छूटे हुए अवसरों’ की छाया इस आधे घंटे की टेलीफोनिक बातचीत पर मंडरा रही थी। लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच संवाद समाप्त हुआ, तो वह केवल एक शिष्टाचार भेंट नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार के विन्यास को बदलने वाला एक 'शंखनाद' सिद्ध हुआ। ट्रम्प का सोशल मीडिया पोस्ट—जिसमें उन्होंने मोदी को "महान मित्र" और "सम्मानित नेता" बताया—इस बात का प्रमाण था कि नई दिल्ली ने दबाव की राजनीति के बीच अपनी शर्तों पर एक नया मार्ग प्रशस्त कर लिया है। अगस्त 2025 से भारतीय निर्यात पर लगे 50 प्रतिशत के दमघोंटू शुल्क का घटकर 18 प्रतिशत पर आना केवल एक आर्थिक रियायत नहीं, बल्कि भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' की एक बड़ी जीत है।
स्वायत्तता की लक्ष्मण-रेखा
इस समझौते की पटकथा उस दौर में लिखी गई जब वाशिंगटन की ओर से 'डेड इकॉनमी' जैसे अपमानजनक विशेषणों और दंडात्मक शुल्कों की बौछार हो रही थी। ट्रम्प प्रशासन के कट्टरपंथी व्यापार सलाहकारों ने भारत को झुकने पर मजबूर करने की हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन नई दिल्ली ने 'मौन कूटनीति' का सहारा लिया। प्रधानमंत्री मोदी का वह संकल्प, कि 'किसानों और पशुपालकों के हितों से कोई समझौता नहीं होगा,' इस द्विपक्षीय व्यापार समझौते की धुरी बना रहा।
भारतीय वार्ताकारों ने उन 'रेड लाइन्स' (लक्ष्मण-रेखाओं) को पार नहीं होने दिया, जो कृषि, डेयरी और जीएम खाद्य पदार्थों के इर्द-गिर्द खींची गई थीं। यह समझौता सिद्ध करता है कि भारत ने 'ट्रम्पियन यथार्थवाद' के साथ सामंजस्य तो बिठाया, लेकिन अपनी संप्रभुता की कीमत पर नहीं। जहाँ यूरोपीय संघ के साथ हालिया समझौता भारत के लिए नए द्वार खोल रहा था, वहीं अमेरिका के साथ यह संधि वाशिंगटन को यह अहसास दिलाने की कोशिश थी कि भारत को हाशिए पर रखना अमेरिकी व्यापारिक हितों के लिए भी आत्मघाती होगा।
आंतरिक राजनीति का कुरुक्षेत्र 
घरेलू मोर्चे पर, इस समझौते को लेकर छिड़ा राजनीतिक संग्राम उतना ही तीव्र रहा जितना कि कूटनीतिक वार्ताएं। विपक्ष द्वारा इसे अमेरिकी दबाव के आगे 'आत्मसमर्पण' बताने की कोशिशें की गईं। राहुल गांधी के आरोपों—कि अडानी मामले और अन्य अंतरराष्ट्रीय दबावों के कारण सरकार झुक गई है—पर वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का तीखा पलटवार इस बात का संकेत है कि भाजपा इस समझौते को 2026 के आगामी विधानसभा चुनावों (तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल) में 'समृद्धि के प्रमाण' के रूप में पेश करने जा रही है। सत्ता पक्ष के लिए यह समझौता 'झुकने' का नहीं, बल्कि 'अधिग्रहण' का विषय है, जहाँ भारत ने वैश्विक मंदी के डर के बीच अमेरिकी बाज़ार में अपनी जगह फिर से सुरक्षित की है।
इस्लामाबाद की छटपटाहट और बीजिंग का संशय
इस व्यापारिक संधि की गूँज केवल बाज़ारों तक सीमित नहीं है; इसके भू-राजनीतिक निहितार्थ पाकिस्तान और चीन के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं हैं। पिछले साल जब पाकिस्तानी नेतृत्व—जिन्होंने स्वयं को 'फील्ड मार्शल' जैसी उपाधियों से अलंकृत किया—व्हाइट हाउस में 'खनिजों के बक्से' भेंट कर ट्रम्प को रिझाने की कोशिश कर रहा था, तब भारत ने मध्यस्थता के हर प्रस्ताव को ठुकराकर यह स्पष्ट कर दिया कि उसकी क्षेत्रीय नीति का केंद्र दिल्ली है, वाशिंगटन नहीं।
पाकिस्तान के 'आउटफ्लैंकिंग' (घेराबंदी) के दावों को अब इस व्यापारिक सच्चाई के सामने एक कठोर 'रियलिटी चेक' मिलेगा। वहीं, चीन के लिए भारत का यह दोहरा दाँव (ईयू और अमेरिका दोनों के साथ समझौता) एक रणनीतिक दुःस्वप्न है। बीजिंग, जो हमेशा भारत को अमेरिका के चश्मे से देखता आया है, अब नई दिल्ली के बढ़ते कद को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाएगा।
एक नया वैश्विक प्रतिमान
अंततः, भारत-अमेरिका व्यापार समझौता यह दर्शाता है कि डोनाल्ड ट्रम्प के अनिश्चित दौर में भी स्थिरता के द्वीप खोजे जा सकते हैं। भारत ने पाँच वर्षों में 500 बिलियन डॉलर की खरीद का जो लक्ष्य रखा है, वह 'सर्वोत्तम प्रयास' की श्रेणी में है, जो भविष्य की खरीदारी को एनवीडिया जैसे हाई-टेक चिप्स और विमानन क्षेत्र से जोड़ता है। यह समझौता दुनिया के अन्य देशों के लिए एक 'नेगोशिएशन मॉडल' है—कि कैसे एक महाशक्ति की आक्रामकता को धैर्य और स्पष्ट नीतिगत सीमाओं के साथ संतुलित किया जा सकता है। रायसीना हिल से निकला यह संदेश स्पष्ट है: भारत अब केवल सहयोग नहीं करता, वह अपनी शर्तों पर साझेदारी का निर्माण करता है। n

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