महागठबंधन द्वारा राज्य से बाहर रह रहे बिहारियों को पिटवाने की तैयारी!
लालू-नीतीश राज्य में बाहरी लोगों को आने के खिलाफ....
30 Jul 2016
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सूत्रों की माने तो बिहार में अब बाहरी लोगों का पढना लिखना और नौकरी करना मुश्किल हो जाएगा. बिहार सरकार ने नौकरी और शिक्षा में स्थानीय लोगों के लिए सीटें रिजर्व करने का मुद्दा उठाकर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है.आरजेडी प्रमुख लालू यादव की मांग पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो हामी भरी ही है.
अब अगर बिहार में इस फैसले पर मुहर लगी तो यहां जितने भी शैक्षणिक संस्थान हैं उसमें 80 फीसदी सीटें बिहार के छात्रों के लिए रिजर्व हो जाएंगी. राज्य सरकार की नौकरियों में भी 80 फीसदी नौकरी बिहार के ही लोगों को मिलेगी.बिहार में कुल 4 लाख सरकारी कर्मचारी काम करते हैं. झारखंड और पूर्वी यूपी के लोग यहां सरकारी और निजी क्षेत्रों में काम करते हैं. हालांकि इनकी संख्या ज्यादा नहीं है, लेकिन जो भी है उन पर इस स्थानीय आरक्षण के लागू होने से असर तो पड़ेगा ही.
पर सवाल यह है कि बिहार में जितने बाहरी लोग नौकरी या पढ़ाई नहीं करते उससे कई गुणा ज्यादा दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात में पढ़ाई और नौकरी करते हैं. वो इसलिए क्योंकि बिहार में अच्छी नौकरी नहीं है, बिहार में अच्छे शिक्षण संस्थान नहीं हैं, हजारों छात्र हर साल डीयू और दूसरी यूनिवर्सिटियों में दाखिला लेते हैं. बिहार में बड़ी कंपनियों का निवेश नहीं है. स्थानीय के सवाल पर ही मुंबई, असम में बिहारियों पर हमले होते रहते हैं. हाल ही में डीयू में भी स्थानीय छात्रों के नामांकन का मुद्दा उठ चुका है जिसका ज्यादा असर बिहार के छात्रों पर ही पड़ने वाला है. ऐसे में नीतीश सरकार का ये फैसला तो बिहार से बाहर रहने वाले बिहारियों पर और ज्यादा असर डाल सकता है.
मतलब साफ़ है कि सुशासन का ढोल पीटने वाले मुख्यमंत्री नीतीश जी कुर्सी पर बने रहने के लिये लालू जी की निम्नस्तरीय राजनीतिक स्टंट का लगातार हिस्सा बने रहना चाहते हैं. वैसे भी राज्य में बढ़ते क्राइम के ग्राफ और इधर विकास के हर मोर्चे पर पिछड़ते रहने के कारण हो रही किरकिरी से बचने के लिए ऐसी बातें जनता का ध्यान कुछ समय के लिये तो आकर्षित कर ही सकती है. पर इसमें स्वयं नीतीश जी को एक व्यक्तिगत नुकसान भी हो सकता है या यूँ कहें तो बड़े भैया लालू जी सोंच-समझकर उन्हें इस योजना के द्वारा उन्हें एक दलदल में फंसाना चाहते हैं. चूँकि नीतीश जी का सपना प्रधानमंत्री की कुर्सी है और इसके लिये वो यूपी चुनाव में साख बढ़ने हेतु जुटे हुए भी हैं, निसन्देह ऐसी स्थानीयता वाली घटिया राजनीति उन्हें नुकसान ही पहुंचाएगी. पर लगता है कि शराबबंदी जैसी पब्लिसिटी देने वाली नीतिओं से वो इतने प्रभावित हो चुके हैं की स्थानीय स्तर पर आरक्षण जैसी सस्ती लोकप्रिय नारे को अपना नया हथियार बनाना चाहते हैं.
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