न्यायपालिका को जुम्मन शेख चाहिये या कोई 'ठाकुर"?
न्यायपालिका बनाम विधायिका .....
25 Aug 2016
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हममें से बहुतों ने स्कूल में महान लेखक प्रेमचंद की पंच परमेश्वर पढ़ी होगी. यह एक ऐसी कहानी है कि बालमन को न्याय की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को इश्वर सदृश्य समझने को मजबूर कर देती है. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही रहा. परन्तु जैसे-जैसे समझ बढ़ी यह भी स्पष्ट होता गया कि सरकार की किसी भी अन्य संस्था की तरह भारतीय न्यायिक प्रणाली भी समान रुप से भ्रष्ट है. और निसन्देह इसके पीडि़त सिर्फ गरीब और आम लोग ही होते हैं क्योंकि अमीर लोग महंगे वकीलों का खर्च वहन कर सकते हैं और कानून अपने पक्ष में कर सकते हैं. जजों की संख्या बढ़ाने, और ज्यादा कोर्ट बनाने की बात पर इस देश के मुख्य न्यायधीश तक भावुक हो जाते हैं परन्तु भारतीय न्यायिक प्रणाली में मौजूद पारदर्शिता की कमी पर बात तक नहीं करते. न्याय की दुहाई देते हुए वर्तमान भारतीय न्याययिक व्यवस्था किसी को भी कठघरे में खड़ा कर सकती है परन्तु स्वयं को सूचना के अधिकार से पूरी तरह से बाहर रखती है. शायद इसलिए देश का आम नागरिक न्यायपालिका के कामकाज के महत्वपूर्ण मुद्दों जैसे न्याय प्रक्रिया के तरीकों और गुणवत्ता तक को ठीक से नहीं जानता है. यह बहुत जरुरी है कि किसी भी देश की न्यायपालिका समाज का अभिन्न अंग हो और उसका समाज से नियमित और प्रासंगिक परस्पर संवाद होता रहे। कुछ देशों में न्यायिक निर्णयों में आम नागरिकों की भी भूमिका होती है। परन्तु भारत में न्यायिक प्रणाली का समाज से कोई संबंध नहीं है जो कि इसे ब्रिटिश न्यायिक सेट-अप से विरासत में मिला है।
सच तो यह है कि वर्तमान न्याय प्रणाली लोकतांत्रिक प्रक्रिया, मानदंड और समय के अनुकूल नहीं है और सिर्फ समाज के एक वर्ग को खुश करने और उनके निहित स्वार्थ के लिए काम करती है। इसलिए इसके तुरंत पुनर्गठन की आवश्यकता है जिससे इसे लोकतांत्रिक और प्रगतिशील समाज के प्रति जवाबदेह बनाया जा सके। परन्तु इन हालातों में अगर देश की न्याय व्यवस्था के सर्वोच्च पद पर बैठा कोई व्यक्ति प्रेमचंद के जुम्मन शेख से सीख ना लेकर बॉलीवुड के मसाला फिल्मों के किसी बिकाऊ जज की तरह आचरण करता है तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिये खतरे की घंटी से कम नहीं.
अतिथि संपादक (लेखक बीजेपी, बिहार में आर्थिक प्रकोष्ठ के उपाध्यक्ष है)
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