भारत-रूस का 'SJ-100' समझौता केवल विमान निर्माण का अनुबंध नहीं, बल्कि पश्चिमी एकाधिकार को चुनौती देती एक सामरिक हुंकार है। तकनीकी संप्रभुता और 'उड़ान' योजना के लक्ष्यों को साधता यह 'नभ-विहंग', क्या भारत को वैश्विक विमानन विनिर्माण का नया शक्ति-केंद्र बना पाएगा? आइए, इस नए औद्योगिक कुरुक्षेत्र का विश्लेषण करें।
संगीत के एक पुराने हिट से लेकर आधुनिक तकनीकी युद्ध तक, दुर्लभ मृदा तत्व आज वैश्विक सत्ता-संतुलन का नया आधार बन चुके हैं। चीन के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए भारत अब खनिज संप्रभुता की निर्णायक दौड़ में उतर चुका है।
कुआलालंपुर में भारत-मलेशिया ने व्यापक रणनीतिक साझेदारी का नया व्याकरण लिखा है। रक्षा, तकनीक और सांस्कृतिक विरासत का यह संगम हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक स्थिरता का एक नया सूर्योदय है।
हालिया बजट सत्र में संसद केवल हंगामे का मंच नहीं, बल्कि सरकार की जवाबदेही की कठोर परीक्षा बन गया। विपक्ष ने सत्ता को ऐसे सवालों के कटघरे में खड़ा किया, जिनसे बचना अब राजनीतिक नहीं, लोकतांत्रिक संकट बनता जा रहा है।
असम के बागानों में ‘टी-ट्राइब’ पहचान तले दबी आदिवासी अस्मिता अब चुनावी गणित को चुनौती दे रही है। यह ऐतिहासिक न्याय और राजनीतिक वजूद
की बहाली का एक निर्णायक शंखनाद है।
सह्याद्रि की अभेद्य पर्वतमालाओं और अरब सागर की उद्दाम लहरों की ओट में बसा महाराष्ट्र, भारतीय राजनीति की वह उर्वर प्रयोगशाला है जहाँ सत्ता का विमर्श अक्सर स्थापित क्षत्रपों और चंद रसूखदार परिवारों की निजी जागीरदारी के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। दशकों तक इस वीरभूमि का अलिखित संविधान यही रहा कि यहाँ का सिंहासन केवल ‘मराठा’ प्रभुत्व के लिए आरक्षित है।
महाराष्ट्र के हालिया स्थानीय निकाय चुनाव किसी साधारण राजनीतिक मुकाबले का परिणाम नहीं, बल्कि एक पूरे युग के क्षय का संकेत हैं। मतदाताओं का झुकाव शिंदे की शिवसेना की ओर यह बताता है कि बाल ठाकरे की विरासत अब स्मृति का विषय अधिक और राजनीतिक शक्ति का स्रोत कम रह गई है। यह चुनाव उस कठोर सच्चाई को सामने रखता है कि महाराष्ट्र की राजनीति अब प्रतीकों से नहीं, सत्ता, संगठन और स्पष्ट वैचारिक दिशा से तय हो रही है।
परिसीमन की प्रक्रिया भारत के लोकतांत्रिक और संघीय ढांचे के लिए एक निर्णायक मोड़ बन चुकी है। यह केवल संसदीय सीटों के पुनर्वितरण का प्रश्न नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व, संतुलन और राष्ट्रीय एकता की गहरी परीक्षा है।
2 फरवरी 2026 की वह शाम भारतीय विदेश मंत्रालय के गलियारों में एक तनावपूर्ण सन्नाटा लेकर आई थी। वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच पिछले एक साल से जारी कूटनीतिक गतिरोध और ‘छूटे हुए अवसरों’ की छाया इस आधे घंटे की टेलीफोनिक बातचीत पर मंडरा रही थी।
अठारह वर्षों की कूटनीतिक जड़ता को तोड़ते हुए भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौता केवल आर्थिक करार नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था की ओर बढ़ता एक निर्णायक कदम है। ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ भारत को व्यापार, तकनीक और रणनीति—तीनों स्तरों पर वैश्विक धुरी के रूप में स्थापित करती है।
केंद्रीय बजट 2026–27 ने भारत को आधुनिक, तकनीक-संचालित और वैश्विक प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनाने की महत्त्वाकांक्षा दिखाई है। लेकिन बुनियादी ढांचे की चमक के पीछे सामाजिक सुरक्षा, रोजगार और समावेशन की चुनौतियां और गहरी होती दिख रही हैं।
बांग्लादेश में बीएनपी की प्रचंड जीत केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की कूटनीति में नए अध्याय का संकेत है। यह जनादेश भारत के लिए आशंका नहीं, बल्कि संतुलित संवाद और रणनीतिक पुनर्संयोजन का अवसर खोलता है।