कान्स, फ्रांस: दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित फिल्मी मेलों में से एक, कान्स फिल्म फेस्टिवल (Cannes Film Festival) के 79वें संस्करण का आगाज 12 मई 2026 से हो चुका है। 23 मई तक चलने वाले इस महाकुंभ में जहाँ एक ओर आलिया भट्ट जैसी समकालीन अभिनेत्रियाँ रेड कार्पेट पर अपनी चमक बिखेर रही हैं, वहीं दूसरी ओर यह समय उन दिग्गजों को याद करने का भी है जिन्होंने विश्व पटल पर भारतीय सिनेमा की नींव मजबूत की।

स्वर्ण युग की शुरुआत: चेतन आनंद और 'नीचा नगर'

भारत और कान्स का रिश्ता करीब आठ दशक पुराना है। 1946 में, दिग्गज निर्देशक चेतन आनंद ने अपनी फिल्म 'नीचा नगर' के साथ इतिहास रचा था। इस फिल्म को कान्स का सबसे सर्वोच्च सम्मान 'पाल्मे डी ओर' (जिसे अब ग्रैंड प्रिक्स कहा जाता है) मिला था। यह भारत के लिए कान्स में पहला और सबसे प्रतिष्ठित मील का पत्थर था।

सत्यजीत रे और मृणाल सेन: सिनेमा के वो स्तंभ

भारतीय सिनेमा के 'मास्टर' सत्यजीत रे की कालजयी कृति 'पथेर पांचली' ने 1955 में कान्स में अपनी जगह बनाई और इसे 'बेस्ट ह्यूमन डॉक्युमेंट' के विशेष पुरस्कार से नवाजा गया।

वहीं, मृणाल सेन न केवल अपनी फिल्म 'खारिज' (1983) के लिए 'बेस्ट ज्यूरी अवॉर्ड' जीतने में सफल रहे, बल्कि वे कान्स फिल्म फेस्टिवल में ज्यूरी मेंबर के रूप में शामिल होने वाले पहले भारतीय निर्देशक भी बने।

जब महिलाओं ने लहराया परचम: मीरा नायर और पायल कपाड़िया

कान्स के मंच पर भारतीय महिला निर्देशकों का योगदान अतुलनीय रहा है:

मीरा नायर: 1988 में उनकी फिल्म 'सलाम बॉम्बे' ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा और प्रतिष्ठित 'कैमरा डी ऑर' अवॉर्ड अपने नाम किया।

पायल कपाड़िया: वर्तमान दौर की सबसे प्रतिभाशाली निर्देशकों में शुमार पायल ने दो बार कान्स में झंडे गाड़े। 2021 में 'नाइट ऑफ नोइंग नथिंग' के लिए उन्हें बेस्ट डॉक्यूमेंट्री का अवॉर्ड मिला, वहीं 'ऑल वी इमेजिन एज अ लाइट' के लिए उन्होंने 'ग्रैंड प्रिक्स' जीतकर इतिहास दोहरा दिया।

कान्स में भारतीय सिनेमा की कुछ प्रमुख जीत

वर्षकलाकार/निर्देशकफिल्मअवॉर्ड
1946चेतन आनंदनीचा नगरपाल्मे डी ओर (ग्रैंड प्रिक्स)
1955सत्यजीत रेपथेर पांचलीबेस्ट ह्यूमन डॉक्युमेंट
1988मीरा नायरसलाम बॉम्बेकैमरा डी ऑर
2013रितेश बत्राद लंच बॉक्सग्रैंड रैल डी ऑर
2015नीरज घायवानमसानFIPRESCI प्राइज

आधुनिक दौर का संघर्ष और सफलता

हाल के वर्षों में, नीरज घायवान की 'मसान' और रितेश बत्रा की 'द लंच बॉक्स' (इरफान खान अभिनीत) जैसी फिल्मों ने साबित किया है कि भारतीय कहानियों में वैश्विक दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने का दम है।

79वें कान्स फिल्म फेस्टिवल के साथ, उम्मीद जताई जा रही है कि इस साल भी भारतीय सिनेमा के खाते में कुछ नई और ऐतिहासिक उपलब्धियां जुड़ेंगी। भारत की यह मौजूदगी केवल ग्लैमर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस कलात्मक विरासत का उत्सव है जो दशकों से निरंतर विकसित हो रही है।