मुंबई: भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं पर आधारित सिनेमाई इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। निर्देशक हार्दिक गज्जर की फिल्म ‘कृष्णावतारम पार्ट 1: हृदयम’ सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। तीन भागों में बंटी इस महागाथा का पहला हिस्सा मुख्य रूप से कान्हा के प्रेम, समर्पण और उनके मानवीय से दिव्य बनने के सफर को दर्शाता है।
कहानी: आस्था और विज्ञान का मेल
फिल्म की शुरुआत आधुनिक काल के भालका तीर्थ से होती है, जहाँ श्रीकृष्ण ने देह त्यागी थी। कहानी में जगन्नाथ पुरी के उस रहस्य को भी छुआ गया है, जिसके अनुसार आज भी मूर्ति में 'हृदय' धड़कता है। जैकी श्रॉफ (स्वामी) के माध्यम से कहानी द्वापर युग में प्रवेश करती है। पहले भाग में कृष्ण के जन्म से लेकर गोकुल-वृंदावन की यादें, राधा से अटूट प्रेम और फिर रुक्मिणी व सत्यभामा के साथ विवाह तक का सफर दिखाया गया है। फिल्म का अंत महाभारत की दहलीज पर होता है।
अभिनय: नए चेहरों का जादू
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसके कलाकार हैं। मेकर्स ने किसी बड़े सुपरस्टार के बजाय फ्रेश चेहरों पर दांव खेला, जो पूरी तरह सफल रहा:
सिद्धार्थ गुप्ता (कृष्ण): उनके चेहरे की मासूमियत और संवादों का ठहराव दर्शकों को प्रभावित करता है। प्रेम हो या क्रोध, सिद्धार्थ हर भाव में जमे हैं।
सुष्मिता भट्ट (राधा): सुष्मिता ने राधा के किरदार को जीवंत कर दिया है। हर फ्रेम में उनकी मौजूदगी दिव्य लगती है।
निवासिनी कृष्णन और संस्कृति जयना: रुक्मिणी और सत्यभामा के रूप में दोनों ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई है।
दिग्गज कलाकार: जैकी श्रॉफ, आशुतोष राणा, दीपक डोबरियाल और कुमुद मिश्रा जैसे कलाकार छोटी भूमिकाओं में भी गहरी छाप छोड़ते हैं।
निर्देशन और विजुअल्स: एक विजुअल ट्रीट
'देवों के देव-महादेव' फेम निर्देशक हार्दिक गज्जर ने बड़े कैनवास पर अपनी पकड़ साबित की है।
भव्य सेट्स और VFX: फिल्म का वीएफएक्स (VFX) ओवरपावर नहीं करता, बल्कि द्वारका और वृंदावन को वास्तविक दिखाता है। स्क्रीन किसी खूबसूरत कैनवास की तरह नजर आती है।
रोंगटे खड़े करने वाले पल: द्रौपदी को श्रीकृष्ण द्वारा 'तथास्तु' कहने वाला दृश्य फिल्म के बेहतरीन पलों में से एक है।
संगीत: कानों में घुलती मिश्री
इरशाद कामिल के लिखे गीतों को श्रेया घोषाल और सोनू निगम ने अपनी आवाज दी है। संगीत मधुर है और कृष्ण की प्रेमलीला के माहौल को पूरी तरह सपोर्ट करता है।
कहां रह गई कमी?
फिल्म की गति कहीं-कहीं धीमी महसूस होती है।
गानों की संख्या अधिक है, जो कहानी के प्रवाह को रोकते हैं।
बाल लीलाओं में इस्तेमाल किए गए ग्राफिक्स को और बेहतर बनाया जा सकता था।
अंतिम फैसला: अगर आप आस्था, प्रेम और भारतीय पौराणिक कथाओं के प्रति रुचि रखते हैं, तो 'कृष्णावतारम' आपके लिए एक अनिवार्य अनुभव है। यह फिल्म न केवल सवालों के जवाब देती है, बल्कि आपको द्वापर युग की यात्रा पर ले जाती है। इसे पूरे परिवार के साथ थिएटर में देखा जाना चाहिए।





