इस्लामाबाद/नई दिल्ली: संगीत की दुनिया का एक चमकता सितारा, आशा भोसले, अब हमारे बीच नहीं रहीं। उनके निधन से न केवल भारत बल्कि सरहद पार पाकिस्तान में भी शोक की लहर दौड़ गई। लेकिन पड़ोसी मुल्क में इस शोक की कवरेज अब एक कानूनी विवाद में तब्दील हो गई है। दिग्गज गायिका को उनके गीतों के जरिए श्रद्धांजलि देना पाकिस्तानी समाचार चैनल 'जियो न्यूज' के लिए गले की फांस बन गया है।

पेमरा (PEMRA) की सख्त कार्रवाई

पाकिस्तान की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी (PEMRA) ने जियो न्यूज को एक 'कारण बताओ नोटिस' जारी किया है। अथॉरिटी का आरोप है कि चैनल ने आशा भोसले के निधन की कवरेज के दौरान भारतीय फिल्मी गीतों और विजुअल्स का इस्तेमाल किया, जो पाकिस्तान में भारतीय कंटेंट पर लगे प्रतिबंध का उल्लंघन है।

पेमरा के अनुसार, यह कवरेज पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश की 'जानबूझकर की गई अवहेलना' है, जो भारतीय सामग्री के प्रसारण पर रोक लगाता है। नोटिस में चेतावनी दी गई है कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो चैनल पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है या उसका लाइसेंस रद्द कर उसे बंद भी किया जा सकता है।

"कला मानवता की साझी विरासत है" : जियो न्यूज का करारा जवाब

इस कानूनी शिकंजे के बीच जियो न्यूज के मैनेजिंग डायरेक्टर अजहर अब्बास ने बड़ी बेबाकी से अपना पक्ष रखा है। उन्होंने सोशल मीडिया (X) पर पेमरा के इस कदम की आलोचना करते हुए अपनी संपादकीय पसंद का बचाव किया।

"जब भी किसी महान कलाकार के बारे में रिपोर्टिंग की जाती है, तो उनके काम का जश्न मनाना एक वैश्विक परंपरा है। आशा भोसले जैसी शख्सियत के मामले में उनके यादगार गीतों को साझा करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है।" — अजहर अब्बास, MD, जियो न्यूज

अब्बास ने आगे तर्क दिया कि कला और ज्ञान सरहदों के मोहताज नहीं होते। उन्होंने याद दिलाया कि आशा जी न केवल पाकिस्तान की 'मल्लिका-ए-तरन्नुम' नूरजहां को अपनी बड़ी बहन मानती थीं, बल्कि उन्होंने नुसरत फतेह अली खान और नासिर काज़मी जैसे पाकिस्तानी दिग्गजों के साथ भी काम किया है।

नफरत के दौर में कला की अहमियत

जियो न्यूज के प्रबंधन का मानना है कि युद्ध और राजनीतिक संघर्षों के बीच कलाकारों को बलि का बकरा नहीं बनाना चाहिए। उनका तर्क है कि संगीत और संस्कृति ही वे माध्यम हैं जो नफरत के खिलाफ खड़े होकर लोगों को करीब लाते हैं।

फिलहाल, चैनल को 14 दिनों के भीतर लिखित जवाब देने और 27 अप्रैल को पेमरा के सामने पेश होने का निर्देश दिया गया है। अब देखना यह है कि क्या पाकिस्तान में संगीत की कला, कानूनी बंदिशों पर भारी पड़ पाएगी या नहीं।