फिल्मी गलियारों से एक ऐसी खबर आई है जिसने 'किशोर दा' के प्रशंसकों को भावुक कर दिया है। साल 1968 की कल्ट क्लासिक फिल्म 'पड़ोसन' का सुपरहिट गाना 'मेरे सामने वाली खिड़की में' हर किसी की जुबान पर रहता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसका एक 'सैड वर्जन' (दुखद संस्करण) भी रिकॉर्ड किया गया था। पांच दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी यह गाना किसी म्यूजिक एल्बम या फिल्म का हिस्सा नहीं बन सका और आज भी रिलीज के इंतजार में है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई 'दर्द भरी' धुन
हाल ही में किशोर कुमार के प्रशंसकों के एक फेसबुक पेज 'क्रेजी फॉर किशोर कुमार' पर इस अनरिलीज्ड गाने की एक कॉपी साझा की गई है। जब फैंस ने 'मेरे सामने वाली खिड़की में' का यह सैड वर्जन सुना, तो हर कोई दंग रह गया। जहाँ मूल गाना अपनी मस्ती और चुलबुलेपन के लिए जाना जाता है, वहीं इसका अनरिलीज्ड वर्जन किशोर दा की आवाज की उस गहराई को दर्शाता है जो सीधे रूह को छू जाती है। इसे सुनकर कई फैंस की आंखें नम हो गईं।
क्यों रिलीज नहीं हुआ यह गाना?
फिल्म निर्माण के दौरान अक्सर कई गाने लंबाई या पटकथा की मांग के अनुसार काट दिए जाते हैं। माना जाता है कि 'पड़ोसन' के मेकर्स को लगा कि फिल्म का मिजाज कॉमेडी है, इसलिए शायद इस उदासी भरे वर्जन की जरूरत नहीं महसूस हुई।
रिकॉर्डिंग: यह गाना 1968 में रिकॉर्ड हुआ था।
सादगी: बिना किसी तामझाम के, किशोर दा की सादगी भरी आवाज इस गाने को और अधिक प्रभावी बनाती है।
'पड़ोसन' में विद्यापति का वो अमर किरदार
फिल्म 'पड़ोसन' में किशोर कुमार ने न केवल अपनी आवाज दी थी, बल्कि 'विद्यापति गुरुजी' के किरदार में अपनी एक्टिंग का भी लोहा मनवाया था। सुनील दत्त, महमूद और सायरा बानो जैसे दिग्गजों के बीच किशोर कुमार अपनी कॉमिक टाइमिंग और अनोखे अंदाज से पूरी फिल्म में छाए रहे। आज भी जब फिल्म का जिक्र होता है, तो पान चबाते हुए गुरुजी की छवि आंखों के सामने तैर जाती है।
फैंस की मांग: आधिकारिक तौर पर हो रिलीज
इंटरनेट पर इस गाने की झलक मिलने के बाद अब किशोर दा के दीवाने मांग कर रहे हैं कि म्यूजिक कंपनियों को इस 'मास्टरपीस' को साफ और बेहतर क्वालिटी में आधिकारिक तौर पर रिलीज करना चाहिए। यह गाना महज एक धुन नहीं, बल्कि भारतीय संगीत के उस सुनहरे दौर की एक अनमोल धरोहर है जिसे दुनिया को सुनना चाहिए।
निष्कर्ष: किशोर कुमार भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी अलमारी में बंद ये अनसुने नग्मे आज भी उनकी मौजूदगी का अहसास कराते हैं। 'पड़ोसन' का यह सैड वर्जन साबित करता है कि किशोर दा सिर्फ हंसाना ही नहीं, बल्कि रुलाना भी बखूबी जानते थे।





