मुंबई। भारतीय संगीत के स्वर्ण युग में जहाँ एक ओर लता मंगेशकर की मखमली आवाज़ हर संगीतकार की पहली पसंद थी, वहीं दूसरी ओर 'हिट मशीन' कहे जाने वाले ओ.पी. नय्यर अपनी अनूठी धुनों से राज कर रहे थे। लेकिन संगीत के इतिहास का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि इन दो दिग्गजों ने कभी साथ काम नहीं किया। आखिर इसके पीछे की वजह क्या थी? क्या यह कोई मनमुटाव था या फिर किस्मत का कोई मोड़?
एक छूटी हुई रिकॉर्डिंग और फिर कभी न जुड़ सका रिश्ता
किस्सा साल 1952 का है, जब ओ.पी. नय्यर अपनी फिल्म 'आसमान' के लिए संगीत तैयार कर रहे थे। उन्होंने एक गाने के लिए लता जी को चुना, तारीख तय हुई और धुन भी फाइनल हो गई। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। लता मंगेशकर उस तय समय पर रिकॉर्डिंग के लिए नहीं पहुंच सकीं।
इस घटना पर बाद में खुद लता जी ने कहा था:
"यह सच है कि मुझे नय्यर साहब के लिए रिकॉर्डिंग करनी थी, लेकिन मैं पहुँच नहीं पाई। मुझे ठीक से याद नहीं कि वजह क्या थी, पर शायद इस बात ने उन्हें ठेस पहुँचाई और फिर हमारे रास्ते कभी नहीं मिले।"
नय्यर का 'अक्खड़' मिजाज और अनुशासन
ओ.पी. नय्यर अपने अनुशासन और तेज़ गुस्से के लिए मशहूर थे। रिकॉर्डिंग स्टूडियो में वे किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करते थे। कहा जाता है कि उनके गुस्से से मोहम्मद रफी और किशोर कुमार जैसे दिग्गज भी नहीं बच पाए थे। यहाँ तक कि उन्होंने किशोर कुमार को 'बेसुरा' गाने पर सबके सामने टोक दिया था।
लता जी ने भी स्वीकार किया कि नय्यर साहब का काम करने का अंदाज़ उन्हें रास नहीं आया। वे एक ऐसे कलाकार थे जो अपनी शर्तों पर काम करना पसंद करते थे और लता जी ने भी उस दूरी को बनाए रखना ही बेहतर समझा।
आशा भोसले का उत्थान और नय्यर का समर्पण
लता जी के साथ काम न करने का एक परिणाम यह हुआ कि ओ.पी. नय्यर ने अपनी पूरी ऊर्जा आशा भोसले की आवाज़ को तराशने में लगा दी। उन्होंने आशा जी को एक ऐसी पहचान दी जिसने उन्हें 'कैबरे' और 'चुलबुले' गानों की रानी बना दिया। हालाँकि, नय्यर साहब ने हमेशा माना कि आशा ने बहुत कोशिश की, लेकिन लता जी का मुकाम अलग था।
साथ काम नहीं किया, पर मन में था गहरा सम्मान
दिलचस्प बात यह है कि साथ काम न करने के बावजूद दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति अपार आदर था। ओ.पी. नय्यर ने एक इंटरव्यू में अपनी साफ़गोई के लिए मशहूर अंदाज़ में कहा था:
"मैं अपने खाने की कसम खाकर कहता हूँ कि लता भारत की नंबर 1 गायिका हैं। उन्हें भगवान ने खुद अपनी आवाज़ दी है। अगर मदन मोहन की गज़लें लता ने न गाई होतीं, तो क्या वे उस ऊंचाई तक पहुँच पातीं?"
निष्कर्ष: ओ.पी. नय्यर के बिना भी लता मंगेशकर 'स्वर कोकिला' बनीं और लता जी के बिना भी नय्यर साहब ने 'उड़ें जब जब जुल्फें तेरी' और 'तारीफ़ करूँ क्या उसकी' जैसे कालजयी गीत दिए। यह संगीत जगत का एक ऐसा अधूरा अध्याय है, जो हमें बताता है कि कभी-कभी दो महान सितारों का न मिलना भी संगीत को दो अलग और समृद्ध धाराएं दे जाता है।





