अखिलेश के बाद राजभर के अंदर जागा जिन्ना का जिन्न,देश के पहले पीएम जिन्ना होते तो न होता देश का बंटवारा
अखिलेश के बाद राजभर के अंदर जागा जिन्ना का जिन्न,देश के पहले प्रधानमंत्री जिन्ना होते तो न होता देश का बंटवारा <Br/> <Br/>
sanjay kumar📍 अन्य, उत्तर प्रदेश

वाराणासी।उत्तर प्रदेश 2022 विधानसभा चुनाव से पहले पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का जिन्न जागने वालों में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष व पूर्व मंत्री ओम प्रकाश राजभर का भी नाम भी जुड़ गया है।समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बाद अब ओम प्रकाश राजभर के अंदर जिन्ना का जिन्न जागा है।राजभर के अंदर जिन्ना का जिन्न इस कदर जागा कि गुणगान करते हुए यहां तक कह डाला कि जिन्ना को अगर देश का पहला प्रधानमंत्री बना दिया गया होता तो देश का बंटवारा ही नहीं होता।
राजभर ने पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी और वरष्ठि भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को भी जिन्ना का प्रशंसक बताया और कहा कि जरा सोचिए अटल जी और आडवाणी जी भी जिन्ना के विचारों की प्रशंसा क्यों करते थे, इस लिए मेरा मानना है कि जिन्ना को अगर देश का पहला प्रधानमंत्री बना दिया गया होता तो देश का बंटवारा ही नहीं होता।
चुनाव आते ही जाग गया जिन्ना का जिन्न
आपको बता दें कि हाल ही में सपा मुखिया अखिलेश यादव ने भी भारत पाकिस्तान के बंटवारे का जिम्मेदार माने जाने वाले पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ की थी।सपा मुखिया ने कहा था कि स्वतंत्रता संग्राम में जिन्ना ने महात्मा गांधी, सरदार पटेल और पं नेहरू की तरह ही अहम भूमिका निभाई थी।भाजपा ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी और जिन्ना प्रेम को चुनावी लाभ के लिए धार्मिक तुष्टीकरण की राजनीति का परिणाम बताया था।
मोहम्मद अली जिन्ना का नाम लेने पर भाजपा को लाभ मिलने की बातें कही जा रही है,लेकिन ध्रुवीकरण की हालत में सपा भी शायद पीछे न रहे, और इसकी वजह ये है कि भले ही जिन्ना के नाम से भारतीय मुस्लिमों को कोई मतलब न हो,मगर जिन्ना नाम पर अगर ध्रुवीकरण होता दिखाई देता है तो उसका असर काउंटर पोलराइजेशन के तौर पर जरूर दिखाई दे सकता है।ऐसे में ये भी कहा जा रहा है कि शायद मुस्लिमों का ज्यादा से ज्यादा वोट हासिल करने के लिए सपा ने ये रणनीति बनाई है।प्रदेश की लगभग 100 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता हेरफेर कर पूरी चुनावी सियासत की दिशा तय कर सकता है और यही कारण है कि जिन्ना पर अखिलेश यादव के बयान को भाजपा के ट्रैप में फंसने की बजाय रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
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