प्रतिनिधि,लोहरदगा। परमेश्वर भगत एक किसान हैं जिनके पास पांच एकड़ उपजाऊ कृषि योग्य भूमि है।ये किस्को प्रखंड के बेटहठ पंचायत के भुषाड़ गांव के निवासी हैं। वर्ष 2018 तक ये अपनी जमीन के आधे हिस्से के 2 एकड़ में सिंचाई की पर्याप्त सुविधा के अभाव में धान (खरीफ) एवं 1/2 एकड़ में मौसमी सब्जी की खेती कर पाते थे। सिंचाई के लिए वर्षा आधारित खेती पर निर्भरता के कारण परिवार की बदहाल आर्थिक स्थिति से तंग आकर अपनी जमीन से 2 किलोमीटर दूर ईंट भट्टे में दैनिक मजदूरी करने का मन बना चुके थे, लेकिन परिस्थितियां बदली और आज परमेश्वर जी अपनी जमीन पर 3 एकड़ में खरीफ एवं रबी फसल के साथ-साथ 1 एकड़ में गोभी, टमाटर, मिर्च एवं ईख की खेती के अलावा अपने तालाब से लगभग 5 क्विंटल मछली का उत्पादन कर अपनी आर्थिक स्थिति सुधार कर पूरे गांव के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। अन्य ग्रामीण इनके कार्यों का अनुकरण कर अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने हेतु प्रयासरत हैं।
जलछाजन परियोजना से जुड़े और बदली तकदीर
वर्ष 2017-18 में किस्को लोहरदगा अंतर्गत ग्राम भुसाड़ में जलछाजन कार्यों की शुरूआत की गई जिसके तहत परमेश्वर भगत की जमीन पर एक तालाब (100×100×10) खोदा गया और 1 एकड़ में मेढ़बंदी कार्य का कार्य किया गया। तालाब में मत्स्य-पालन हेतु प्रथम वर्ष में 1 लाख स्पॉन एवं वर्ष 2020-21 में 2000 फिंगरलिग्ंस एवं तीन माह का मत्स्य-चारा उपलब्ध कराया गया। लाभुक द्वारा मत्स्य-पालन में रूचि लेते हुए उनके द्वारा तालाब में अतिरिक्त 1 लाख स्पॉन डाला गया था जिसका उत्पादन लगभग 6 क्विंटल करते हुए 1 लाख रूपये की आमदनी हुई एवं दूसरी बार लगभग 3 क्विंटल का उत्पादन करते हुए 50 हजार रूपये की आमदनी हुई।
इसके अलावा सब्जी - फूलगोभी, पत्तागोभी, टमाटर, मिर्च एवं गन्ने की खेती से लाभुक को लगभग 10 हजार रूपये की अतिरिक्त आमदनी हुई। गेंहू की खेती 2 एकड़ में करते हुए 10 क्विंटल का उत्पादन कर 20 हजार रूपये कमाए एवं धान की खेती 2 एकड़ में करते हुए 20 क्विंटल का उत्पादन कर 30 हजारकी कमाई की है। तालाब में पझरा निकल जाने के कारण तालाब में सालोंभर पानी रहने से सिंचाई की सुविधा हो गई है। तालाब के मेड़ पर लौकी, अरहर एवं भिण्डी की खेती कर अतिरिक्त उत्पादन कर लाभुक सफलता का स्वाद चख चुके हैं और आगे भी अपनी जमीन से अधिक से अधिक लाभ कमाने के लिए प्रयासरत हैं। मेढ़बंदी के कारण खेत की नमी को बढ़ाने एवं मिट्टी के सरंक्षण हेतु कार्य किए गए हैं। उनसे प्रेरित होकर वैसे ग्रामीण जो पहले अपनी जमीन परियोजना कार्य हेतु देने में झिझकते थे, उनमें अपनी जमीन में परियोजना का लाभ लेने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।





