वाराणसी।देश-विदेश के पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर खींच ले आती है काशी नगरी की माटी,हस्तकला,संगीत,पर्व उत्सव व अल्हड़पन बनारस की जगमग थाती,अपने बूते हजार करोड़ विदेशी मुद्रा ले आती है धर्म और पर्यटन की ये नगरी काशी।
धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए पूरे विश्व में वाराणसी मशहूर हैं।जब भी वाराणसी की बात होती है तो कभी कोई उसे बनारस तो कोई काशी के नाम से पुकारता है।वैसे वाराणसी को अधिकतर लोग बनारस के नाम से जानते हैं। इसके अलावा काशी का नाम भी इस पावन धरती को जाना जाता है।आखिर वाराणसी को बनारस या काशी के नाम से क्यों जाना जाता है।जानिए इस शहर के इन नामों की क्या कहानी है और क्यों बार बार नाम बदलते गए।साथ ही हर शहर के नाम के पीछे भी एक अलग कहानी है।
क्या है काशी का मतलब
वाराणसी का सबसे पुराना नाम काशी है।धार्मिक ग्रंथों में भी इस शहर का महिमामंडन काशी के नाम से ही किया गया है। ये नाम करीब 3000 सालों से बोला जा रहा है।काशी को कई बार काशिका भी कहा गया। अगर इस शब्द के मतलब की बात करें तो इसका मतलब है चमकता हुआ।इसे कहा जाता है कि बाबा भोलेनाथ की नगरी होने की वजह से ये हमेशा चमकती रही है।काशी शब्द का अर्थ उज्वल या दैदिप्यमान से है।वैसे कई धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख है।कई रिपोर्ट में बताया गया है कि प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में भी काशी का उल्लेख है।इसके अलावा स्कन्दमहापुराण में काशीखंड है, जिसमें इस शहर का जिक्र है।पुराणों के अनुसार यह आद्य वैष्णव स्थान है।
क्या है बनारस की कहानी
वाराणसी का सबसे प्रसिद्ध नाम बनारस है।आज भी बहुत से लोग इसे बनारस के नाम से जानते हैं।मुगलों काल और फिर अंग्रेजी हुकूमत में इसका नाम बनारस ही रहा। महाभारत में बार बार इसका जिक्र हुआ है।दरअसल इसका पाली भाषा में नाम बनारसी था और वो फिर बनारस बन गया।जहां तक बनारस नाम का संबंध है तो उसे बनार नामक राजा से जोड़ा जाता है।जो यहां मोहम्मद गोरी के हमले के समय मारे गए थे। कहा जाता हैं कि यहां की जिंदगी के रंगों को देखकर मुगलों ने बनारस नाम रखा और इसी नाम से पुकारते रहे।इसके अलावा भी बनारस की कई और कहानियां हैं।
वाराणसी कहां से आया नाम
वाराणसी का भी प्राचीन नाम है। इसका उल्लेख भी बौद्ध जातक कथाओं और हिंदू पुराणों में है।बनारस का नया नाम वाराणसी है।इस पवित्र शहर से होकर गुजरने वाली दो नदियां वरुणा और असि के नाम पर रखा गया।वरुणा नदी और असि नदी दोनों ही वाराणसी से ही होकर गुजरती हैं। यूं तो वाराणसी से कई छोटी-बड़ी नदियां गुजरती हैं,लेकिन इन दो नदियों का शहर के साथ कुछ अलग ही लगाव है।वाराणसी में वरुणा नदी उत्तर में गंगा नदी के साथ मिलती है तो असि नदी दक्षिण में गंगा से मिलती है।
आपको बता दें कि 15 अगस्त 1947 से पहले बनारस के तत्कालीन महाराजा विभूतिनारायण सिंह थे।आजादी के बाद जब अलग-अलग रियासतों का विलय हो रहा था।तब महाराजा विभूतिनारायण सिंह ने अपनी रियासत का भारत में विलय के पत्र का हस्ताक्षर कर दिया।आजादी के बाद जब उत्तर प्रदेश बना तो इसमें टिहरी गढ़वाल, रामपुर और बनारस रियासत को मिलाया गया। 24 मई 1956 को शहर का नाम बदला गया।
और भी हैं कई नाम
काशी, बनारस, वाराणसी के अलावा इस शहर का नाम अविमुक्त क्षेत्र, आनन्दकानन, महाश्मशान, रुद्रावास, काशिका, तप:स्थली, मुक्तिभूमि, शिवपुरी, त्रिपुरारिराजनगरी, विश्वनाथनगरी,‘मंदिरों का शहर, भारत की धार्मिक राजधानी, भगवान शिव की नगरी, दीपों का शहर, ज्ञान नगरी के नाम से भी जाना जाता है. इसके अलावा, कई जगह इसका नाम शंकरपुरी, जित्वारी, आनंदरूपा, श्रीनगरी, अपूर्णभावाभावभूमि, शिवराजधानी, गौरीमुख, महापुरी, तप:स्थली, धर्मक्षेत्र, विष्णुपुरी, हरिक्षेत्र, अलर्कपुरी, नारायणवास, ब्रह्मवास, पोतली, सुदर्शन, जयनशीला, रम्यनगर, सुरुंधन, पुष्पवती, केतुमती, मौलिनी, कासीपुर, कासीनगर, कासीग्राम भी है।





