वाराणसी।बनारस विश्व के सबसे पुराने शहरों में से एक जो समय के साथ चलकर भी रुका हुआ सा महसूस होता है,जो दिलों में तो आता है, लेकिन समझ में नहीं आता है।इतना अनछुआ है कि आप छू नहीं सकते हैं।बस गंगा जल की तरह अजूरी में भर सकते हैं।बनारस धार्मिक के साथ-साथ आध्यात्मिक शहर भी है।यहां जीवन और मृत्यु साथ-साथ चलते हैं।कई सदियां बीत गई और इस बदलते हुए संसार में लोग ही नहीं बल्कि शहर भी बदल गए,लेकिन बनारस आज भी वैसा है।मस्ती और हुल्लड़बाजी के बीच बम बम बोल रही है काशी नजर आती है।मुस्कराहट के साथ रस से भरी गाली का अंदाज ऐसा निराला है कि मुंह से निकल ही जाता है ई हौ राजा बनारस।
बनारस की पुराणों से भी पुरानी नगरी होने की मान्यता है। पौराणिक मान्यता ये भी है कि इस बनारस का न आदि है न अंत है।कलकल बहती मां गंगा बनारस को तीनों लोको से न्यारी बनाती हैं।बनारस में गंगा ही नहीं बल्कि दो नदियां वरूणा और अस्सी भी बहती है।गंगा की दो सहायक नदियां वरुणा और अस्सी के नाम पर इसका नाम वाराणसी पड़ा। वाराणसी के पूरब में गंगा नदी बहती है,दक्षिणी में अस्सी नदी मिलती थी जबकि वरुणा नदी उत्तरी सीमा बनाती थी।
बनारस की भावी पीढ़ी अब ये नहीं महसूस कर पाएगी कि काशी का नाम वाराणसी क्यों पड़ा। बनारस को अस्सी और वरुणा नदी के आधार पर वाराणसी नाम दिया गया।वो अस्सी नदी अब इतिहास हो गई।अस्सी नदी पहले अस्सी घाट के पास गंगा में मिलती थी,लेकिन गंगा कार्य योजना के बाद से अस्सी को मोड़ कर लगभग दो किलोमीटर बाद में गंगा में मिला दिया गया है।यही नहीं सरकारी फाइलों में भी इसे अस्सी नदी नहीं बल्कि अस्सी नाला का नाम दे दिया गया है।बनारस की आज की पीढी को तो शायद पता भी नहीं होगा कि अस्सी नाला पहले एक नदी थी।
चार दशक पहले जिस नदी के पानी से लोग आचमन करते थे, आज वहां से गुजरना मुश्किल है।अस्सी नदी का उद्गम स्थल वाराणसी का ही कंदवा है।वहां से चितईपुर, करौंदी, करमजीतपुर, नेवादा, सरायनंदन, नरिया, साकेत नगर नगवां से गुजरते हुए गंगा में मिलती है।अस्सी कुल आठ किलोमीटर लंबी है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां दुर्गा ने असुर शुम्भ-निशुम्भ का वध करने के बाद जहां अपनी तलवार फेंकी थी,उस स्थान पर ही महादेव कुंड बना और इससे निकले पानी से ही अस्सी नदी का उद्गम हुआ।अस्सी नदी और अस्सी घाट का वर्णन गोस्वामी तुलसीदास की मृत्यु में भी मिलता है।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के महामना मालवीय गंगा रिसर्च सेंटर के चैयरमेन प्रो. बीडी त्रिपाठी बताते हैं कि अस्सी बनारस के दक्षिण सीमा को बनाती है तो वरूणा उत्तरी को।दोनों नदियां गंगा में मिल जाती है।बनारस में गांगा अर्धचंद्राकार है और अस्सी नदी की वजह से कभी भी बनारस के घाट पर बालू का डिपॉजिशन नहीं होता था।वहीं गंगा एक्शन प्लान फेज -1 के दौरान अस्सी को एक किलोमीटर दूर ले जाकर गंगा में संगम कराया गया। नदी पहले अस्सी घाट पर गंगा में मिलती थी उसका पोजिशन बदल दिया गया जो ठीक नहीं हुआ था। उन्होंने बताया कि अस्सी नदी के किनारे आज के समय बेतहासा अवैध निर्माण हुए हैं।गंगा की सफाई बिना अस्सी नदी की सफाई नहीं हो सकती है।
अस्सी नदी मुक्ति अभियान के संयोजक कपिन्द्र तिवारी ने बताया कि अस्सी नदी का मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में चल रहा है।तीन जजों की बेंच ने 232 पेज की अंतरिम रिपोर्ट जारी की है।जिसमें हलफनामे के तौर पर वाराणसी जिला प्रशासन ने जो कार्य योजना प्रस्तुत की उसमें नदी का कायाकल्प करने की बात कही है।
इस नदी को एक किलोमीटर बाद गंगा में मिलाने के कारण अब पानी अस्सी घाट से दूर चला गया है।अब विशालकाय सीढियां अस्सी घाट पर आपका स्वागत करतीं हैं।गंगा का पानी दूर चला गया है।देश की अन्य नदियों की तरह अस्सी नदी में भी आबादी और उद्योगों से निकला गंदा जल ही मुख्य समस्या है।इसमें जगह-जगह कचरे के ढेर भी मिलते हैं।अस्सी नाले को फिर से अस्सी नदी के रूप में वापस लाने के लिए अभी एक लंबा सफर तय करना होगा।अवैध निर्माण और शहर के सीवेज ही अस्सी नदी की मुख्य समस्या है।आशा है कि आने वाले दिनों में जिन नदियों ने इस शहर को नया नाम दिया वो फिर से अपने पुराने स्वरूप में वापस लौटेंगी।





