बरेली।देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बीच स्थित बरेली जिला है।बरेली को नाथनगरी भी कहा जाता है। यहां का सर्वश्रेष्ठ धार्मिक महत्व के स्थलों में अलखनाथ मंदिर को गिना जाता है। अलखनाथ मंदिर नागाओं का प्राचीन मंदिर है।जिसे आनंद अखाड़ा संचालित करता है।अलखनाथ मंदिर नागा साधुओं की भक्तिस्थली है।
अलखनाथ धर्मस्थल का है अपना-अलग महत्व
अलखनाथ मंदिर में हर दिन भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन श्रावण मास के महीने में भक्तों की कई-कई किलोमीटर तक लाइन लग जाती है।यहां विशेष तौर पर देवाधिदेव महादेव की पूजा होती है।सदियों से इस धर्म स्थल पर भक्तों की अटूट आस्था है।यहां आकर शिवलिंग पर जलाभिषेक करने और ध्यान लगाने से भक्तों का कल्याण हो जाता है।उनकी तमाम बाधाएं दूर होती हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।यहां दूर-दूर से लोग पूजा करने आते हैं। साधु-महात्मा तो यहां हर समय आते ही हैं। देवाधिदेव महादेव समेत सभी देवी देवताओं का विधिविधान से हर दिन पूजन होता है। इसके साथ ही मंदिर में भगवान सूर्य भी विराजमान हैं।भगवान सूर्य की विशेष पूजा होती है।इस परिसर में सैंकड़ों वर्ष पुराना वृक्ष भी है।इसकी जटाएं प्राचीनता का प्रमाण हैं।
एक हजार वर्ष पुराना है इतिहास
बताया जाता है कि धर्म की रक्षा के लिए इस मंदिर का निर्माण लगभग एक हजार वर्ष पहले किया गया था। सैंकड़ों वर्ष पूर्व पुराने मंदिर का अपना एक पौराणिक और वैदिक इतिहास है। श्री तपोनिधि पंचायती आनंद अखाड़े की तरफ से बाबा अलाखिया को बरेली भेजा गया था।
बाबा अलखनाथ की ख्याति से हर कोई है वाकिफ
बाबा अलाखिया ने यहां वर्षों तक तमाम ऋतुओं की परवाह किए बिना कठोर तप यहां किया था।उन्होंने इस धर्मस्थल पर शिवलिंग की स्थापना करते हुए भगवान शिव में ध्यान लगाया था।आज नागा साधुओं की कर्मस्थली के तौर पर भी इस धार्मिक स्थान को माना जाता है।
हनुमानजी की 51 फीट ऊंची मूर्ति है आकर्षण का केंद्र
अलखनाथ मन्दिर के मुख्यद्वार के ठीक बराबर में हनुमानजी की 51 फीट ऊंची मूर्ति लगी है।यह श्रद्धालुओं के बीच आकर्षण का केंद्र है।यहां शनिदेव का मंदिर भी है। भक्तों का हर समय तांता लगा रहता है।पंचमुखी हनुमान मंदिर,नवग्रह मंदिर भी स्थापित है।
पानी में उतराने वाला पत्थर गायब
स्वर्गीय देव गिरी महाराज रामेश्वरम से 42 वर्ष पहले पानी में उतराने वाला पत्थर लेकर आए थे।इसको मंदिर के दूसरे प्रवेश द्वार पर रखा गया।जिससे रामेश्वरम नहीं जा पाने वाले श्रद्धालु मंदिर में पहुंचकर पत्थर के दर्शन कर सकें।शहर ही नही दूसरे जिलों से भी श्रद्धालु मंदिर में सिर्फ इस पत्थर की महिमा को सुनकर दर्शन के लिए आते थे,लेकिन 1 वर्ष पूर्व पत्थर चोरी हो गया था। इससे पत्थर के दर्शन नहीं हो पाते।
84 बीघा क्षेत्रफल में स्थित है ये धर्मस्थल
मंदिर की भव्यता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मन्दिर के मुख्यद्वार के ठीक बराबर में ही बजरंगबली हनुमान जी की 51 फीट ऊंची मूर्ति लगी हुई है।साथ ही प्रवेश करने पर भगवान शनिदेव का मन्दिर भी शनि शिंगणापुर के स्वरूप में स्थित है।
भक्तों का लगा रहता है हर समय तांता
इतना ही नहीं यहां पंचमुखी हनुमान मंदिर तो है ही, साथ ही नवग्रह मंदिर भी स्थापित है।नागा साधुओं को यहां भक्ति में डूबे हुए देखा जा सकता है।हर समय यहां साधुओं का आवागमन भी देशभर से हुआ करता है।
भगवान शिव की भक्ति में तल्लीन रहते हैं साधु-महात्मा
यहां प्रदेशभर से भी नागा साधुओं के बारे में करीब से जानने वाले लोग आते हैं और धार्मिक अनुष्ठान व पूजा-पाठ भी यहां करते हैं।अब तक अलग-अलग समय पर अलखनाथ मंदिर में कई महंत हुए हैं। उन महंतों ने हमेशा देश और समाज के हित के लिए काम किया है।
मुस्लिमों के प्रवेश पर है रोक
मुगलकाल में जब सनातन संस्कृति को नष्ट किया जा रहा था तो धर्म की रक्षा के लिए आनंद अखाड़े के बाबा अलाखिया को यहां भेजा गया। देवाधिदेव महादेव के अनन्य भक्त बाबा अलाखिया ने यहां देवाधिदेव महादेव की कठोर तपस्या कर शिवलिंग की स्थापना की।जिसके बाद मुस्लिम शासक देवाधिदेव महादेव के तपोवन में प्रवेश नहीं कर पाए। अलाखिया बाबा के नाम पर ही मंदिर का नाम अलखनाथ मंदिर पड़ा।यहां अभी भी मुस्लिमों का प्रवेश वर्जित है का बोर्ड लगा हुआ है।





