प्रतिनिधि, दुमका। सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका के स्नातकोत्तर मनोविज्ञान विभाग में मंगलवार को विभागाध्यक्ष डॉ. विनोद कुमार शर्मा की अध्यक्षता में व्यक्तित्व विकार कारण एवं समाधान विषय पर एक विभागीय सेमिनार आयोजित किया गया।





कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. विनोद कुमार शर्मा ने कहा कि व्यक्तित्व विकार एक एक ऐसा मानसिक विकार है, जिसमें व्यक्ति भिन्न तरह के जीवन शैली को अपनाकर चलते है। उनके सोच, सिद्धांत व व्यवहार सामाजिक मानकों से अलग विचित्राओं से भरे होते है। ऐसे व्यक्तित्व विकार के लोगों के कार्य, व्यवहार व संबंध ही नही खराब होते है बल्कि हत्या, आत्महत्या व दुर्घटना का भी एक प्रमुख कारण समझे जाते है। अध्ययनों की माने तो वर्ल्ड में कोई भी पी डी का प्रचलित दर 7.8 % है तो भारत में व्यस्कों में 9.1 तो किशोरों में 15% है। यंग ग्रूप में सबसे कॉमन इमोशनल इंस्टेबिलिटी डिसॉर्डर 28.6% देखने को मिला।





वर्तमान में खासकर युवा सही मार्गदर्शन के अभाव में तनाव व असामंजस्य की के चौराहे पर खड़ा दिखता है। जीवन में सही निर्णय लेने की अक्षमता व ज्ञानाभाव जहां उसमें अविश्वास व हीनता की भावना उत्पन्न करता है वही दोषपूर्ण सामाजीकरण के कारण व्यक्तित्व विकार के लक्षणों से घिर भी जाते है। इतना ही नही व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक वाट्सन् की माने तो व्यक्तित्व विकार में वातावरण विशेष की भूमिका अहम होती है। जेनेटिक, बचपन व किशोरावस्था की द्वंद्ध, कुंठा, उपेक्षा, बाल्यकालीन आघात, वर्बल अब्यूज, हाई रियेक्टिविटी, आदि जहां व्यक्तित्व विकार के कारण बनते है।वहीं उसमें चारित्रिक दोष का भाव भी उत्पन्न करता है। साथ ही उनमें जहां व्यवहारिक विचलनशीलता का मार्ग प्रशस्त करता है तो वहीं पुअर गाइडेंस व मेनटरिंग के कारण उसे मनोविकारी लक्षणों की ओर धकेल देता है। जहां बच्चे हो, या किशोर या युवा अपनी हीनता को भावना व कमजोरियों की क्षतिपूर्ति में व्यक्तित्व विकार का शिकार हो जाता है। सोशल मीडिया का दुष्प्रभाव, गलत संगति, नशा, रोजगार के अवसरों का न मिलना, आदि जहां उसे उग्र व विचलित बनाता है। वहीं युवा दुविधा व असुरक्षा की भावना के बीच रह कर अनेकों विसंगत व अशोभनीय व्यवहारों का आदि बन जाता है। आवेश में आकर हत्या करता है तो आत्महत्या भी। विषम,असंतोष व सशंकित वातावरण में जहां वो दूसरों के प्रति शक व अविश्वास में पैरानोइड पर्सोनालिटी डिसॉर्डर, विचारों व व्यवहारों के रेपिटिसन में ओबसीसिव कंपल्सिव , समाज से अलग पलायन वादी व्यवहार सिजोइड , मानकों के विरुद्ध आपराधिक व्यवहार करना एंटी सोशल, उदासीनता में जीना डिप्रेसिव तो ध्यान खींचने के लिए नाटकीय व्यवहार करना हिस्ट्रियोनिक तथा दूसरे पर अध्याधिक् निर्भर हो चलना डिपेंडेस् पर्सोनालिटी डिसॉर्डर को दर्शाता है। इसी प्रकार सभी शीलगुणों को धारण कर चलने वाला मिक्सड पर्सोनालिटी डिसॉर्डर तथा अनेको मनोविकृत गुणों को समाहित कर चलने वाला मल्टिपल पर्सोनालिटी डिसॉर्डर, का व्यक्ति कहा जाता है, जिससे समाज को तत्काल कोई नुकसान तो नही होता है, लेकिन ऐसे व्यक्ति का आचरण व व्यवहार दूसरे के लिए परेशानी , तनाव, चिंता, चिड़चिडापन , आदि उत्पन्न करने वाला अवश्य बन जाता है। नैदानिक तौर पर ऐसे व्यक्ति मनोचिकित्सक के पास नही के बराबर आते है। कोमोर्बिड की स्थिति में पकड़े जाते है और उनका मनोचिकित्सीय इलाज किया जाता है,जिसमें मनोगत्यात्मक सहित डिसॉर्डर अनुसार दवा व संज्ञानात्मक व व्यवहार चिकित्सा दी जाती है।जहां उसके चिंता,अनुभव, विचार, मूड्स एवं व्यवहारों में अपेक्षित बदलाव लाया जाता हैं।