प्रतिनिधि,हंटरगंज (चतरा)। प्रखंड मुख्यालय स्थित मार्गदर्शन केंद्र में भारत के प्रथम सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य की जन्मोत्सव मनाई गई । इस मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में सामाजिक चिंतक एवं विश्लेषक शिक्षक सह समाजसेवी रविंद्र कुमार रवि आमंत्रित थे।सबसे पहले मुख्य अतिथि रविन्द्र कुमार रवि के द्वारा दीप प्रज्वलित कर चंद्रगुप्त मौर्य की तस्वीर पर माल्यार्पण करते हुए श्रद्धा सुमन अर्पित किया गया । बारी बारी से कई अतिथियों ने चंद्रगुप्त मौर्य के तस्वीर पर श्रद्धासुमन अर्पित किए। साथ ही छात्र-छात्राओं ने भी श्रद्धा सुमन अर्पित किए।





इस मौके पर मुख्य अतिथि रविंद्र कुमार रवि ने बताया कि अखंड भारत के स्थापना करने वाले चंद्रगुप्त मौर्य भारत के प्रथम सम्राट थे। चंद्रगुप्त मौर्य को चाणक्य ने अपनी विद्वता से एक सम्राट का रूप दिया और चंद्रगुप्त मौर्य फिर पीछे मुड़कर नहीं देखे । चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म 340 ईसवी पूर्व पिता सर्वार्थसिद्धि एवं माता जी मूरा के घर में पाटलिपुत्र में हुआ था ।क्षबड़ा होकर चंद्रगुप्त बहुत ही प्रतापी सम्राट बने। चाणक्य एवं पोरस की सहायता से मगध के सिंहासन पर बैठे एवं युनानियोंं से भारत को मुक्त किया तथा घनानंद के साम्राज्य जो मगध पर स्थापित था उसे खत्म कर मगध सम्राट बने। समकालीन अखंड भारत की शासन व्यवस्था मगध से संचालित होती थी। पूरा भारत को चंद्रगुप्त मौर्य ने 18 महाजनपदों में बांटा था । चंद्रगुप्त मौर्य के कई युद्ध सेल्यूकस के साथ , घनानंद के साथ अन्य राजाओं के साथ हुए। उन्होंने सेल्यूकस को पराजित कर हेरात , कंधार , काबुल , मकराना आदि क्षेत्रों को जीतकर भारत में मिला लिया था।जूना अखंड भारत का निर्माण किया। चंद्रगुप्त ने तीन शादियां की थी प्रथम पत्नी दुर्धरा,जिससे बिंदुसार पुत्र पैदा हुए, द्वितीय पत्नी सेल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया हेलेना,जिससे पुत्र जस्टिन एवं तृतीय पत्नी चंद्र नंदिनी थीं।चंद्रगुप्त मौर्य की शासन व्यवस्था बहुत ही सशक्त एवं लोक प्रिय थी।राजा चंद्रगुप्त मौर्य भारत को एक सशक्त भारत के रूप में स्थापित किया।चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने काल में किसी विदेशियों को भारत में घुसने नहीं दिया।जिंदगी के अंतिम क्षण में चंद्रगुप्त मौर्य जैन धर्म से प्रभावित हो गए थे।वह जीवन के अंतिम क्षण में जैन आचार्य भद्रबाहु से प्रभावित होकर जैन धर्म स्वीकार करते हुए राजपाट त्याग दिए और अपना पुत्र बिंदुसार को राजगद्दी सौंपकर वे भद्रबाहु से दीक्षा लेने चले गए। श्रवणबेलगोला मैसूर कर्नाटक में उन्होंने 297 ई.पू. समाधि लिये। चंद्रगुप्त मौर्य कम उम्र में ही एवं कम शासनकाल में हैं।भारत में एक प्रतापी राजा के रूप में अपने आप को स्थापित कर भारत को एक सशक्त भारत के रूप में अखंड भारत के रूप में और शक्तिशाली भारत के रूप में पूरे दुनिया में अपना परचम लहराया था । उनका पोता चक्रवर्ती सम्राट अशोक भी काफी चमके एवं नाम कमाया। चंद्रगुप्त मौर्य के शासन को बढ़ाया।





इस मौके पर शिक्षक सुरेंद्र मंडल ने चंद्रगुप्त मौर्य को एक बड़ा ही पराक्रमी साहसी और निडर सम्राट बताया । शिक्षक हीरालाल साह ने चंद्रगुप्त मौर्य को एक कुशल राजनेता एवं सम्राट बताया । शिक्षक राकेश कुमार ने चंद्रगुप्त मौर्य को भारत का सर्वश्रेष्ठ शक्तिशाली राजा बताया । इस मौके पर अन्य पदाधिकारी एवं अतिथि गण अपना अपना वक्तव्य दिए । मौके पर खुशी , राखी , चिंकी ,नीतू ,कशुम,शम्मी, रवि रंजन ,राहुल ,रोहित कुमार ,आयुष ,विकी, पप्पू, आशीष, ग्रामीण वकील सिंह सहित दर्जनों छात्र-छात्राएं दर्जनों उपस्थित थे ।