विशेष संवाददाता
गिरिडीह। गिरिडीह के जैन समाज के सम्मेद शिखर तीर्थंकर पार्श्वनाथ को बचाने की मुहिम के प्रखर जैन मुनि प्रमाण सागर जी महाराज ने सोमवार को पूर्वांचल सूर्य के विशेष संवाददाता से एक भेंट में कहा कि पर्यटन स्थल और तीर्थ स्थल में मौलिक अंतर है, पर्यटन लोग मौज मस्ती और मनोरंजन के लिए करने जाते हैं जबकि तीर्थ मन की शुद्धि, आत्मा की शुद्धि के लिए जाते हैं। हमारा तीर्थ बचा रहे हमारी भावनाएं आहत ना हो यही हम चाहते हैं। उन्होंने कहा कि हम यहां पर्यटन शब्द पसंद नहीं करते,सरकार का दायित्व है कि हमारे तीर्थ के पवित्रता की रक्षा करे।
महराज जी ने आगे कहा कि जैन धर्म में सम्मेद शिखर को सबसे प्रमुख और बड़ा तीर्थ स्थान माना जाता है, इस पवित्र स्थान की महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जैन धर्म के सभी तीर्थों में इसे सर्वश्रेष्ठ है, जिसने इसे नहीं देखा उसका जीवन अधूरा माना गया है।कहा कि जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों के साथ ही कई संतों और मुनियों ने यहां मोक्ष प्राप्त किया है,यही कारण है कि इस तीर्थ स्थल को सिद्ध क्षेत्र कहा जाता है।साथ ही कहा कि सम्मेद शिखर की महत्ता को देखते हुए हम अन्य लोगों द्वारा इसके घूमने फिरने की जगह के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते हैं क्योंकि इस तीर्थ में लोग उपवास करके भूखे प्यासे पर्वत पर चढ़ कर नियमों के अनुसार आस्था के साथ इसका दर्शन करते हैं और जब इसे पर्यटन स्थल बना दिया जाएगा तो इसकी पवित्रता पर प्रभाव पड़ेगा,जो स्वीकार्य नहीं है।उन्होंने सरकार और स्थानीय जनता पर पूरा विश्वास प्रकट करते हुए कहा कि सरकार हमारे धर्म स्थल को तीर्थ स्थल घोषित कर रक्षा करेगी।





