अदृश्य आकाश, रक्तरंजित अरण्य

पूर्वोत्तर के अभेद्य जंगलों में अब बारूद की गंध के साथ एक अदृश्य तकनीकी जाल बिछाया जा रहा है। विदेशी हस्तक्षेप और ड्रोन-सैटेलाइट की जुगलबंदी ने पारंपरिक संघर्ष को अत्याधुनिक विभीषिका में बदल दिया है, जो भारत की सामरिक संप्रभुता के सम्मुख गंभीर चुनौती है।

15 Apr 2026  |  25

हाल ही में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा सात विदेशी नागरिकों की गिरफ्तारी ने भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठानों में एक तीव्र स्पंदन पैदा कर दिया है। एक अमेरिकी और छह यूक्रेनी नागरिकों की यह संलिप्तता केवल एक आपराधिक कृत्य नहीं, बल्कि भारत की अखंडता के विरुद्ध रचे जा रहे एक वैश्विक अधि-वृतांत का हिस्सा है। गैर-कानूनी गतिविधियां अधिनियम की धारा 18 के अंतर्गत की गई यह कार्रवाई उस सूक्ष्म तंत्र को उजागर करती है, जो यूरोप से अवैध ड्रोन मंगाकर उन्हें म्यांमार और मिजोरम के सशस्त्र विद्रोही समूहों तक पहुंचा रहा था। यह न केवल हथियारों की तस्करी है, बल्कि यह युद्ध के उस 'आउटसोर्सिंग' मॉडल का प्रमाण है, जहां तकनीकी प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक सहायता सीमाओं को लांघकर भारत के दुर्गम अंचलों में प्रवेश कर रही है।
भारत की अरण्यानी (जंगल), चाहे वे उत्तर-पूर्व के उष्णकटिबंधीय वर्षावन हों या तटीय दलदली क्षेत्र, सदैव से सैन्य अभियानों के लिए एक कठिन चुनौती रहे हैं। जैसे-जैसे भारतीय सशस्त्र बल 'एकीकृत थिएटर कमांड' (इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड) की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, जंगलों में युद्ध का व्याकरण पूर्णतः बदल चुका है। अब यह लड़ाई केवल आमने-सामने की मुठभेड़ नहीं रही। इसमें दो प्रमुख मोर्चे हैं: प्रथम, पारंपरिक सेनाओं के मध्य सामंजस्य और द्वितीय, 'प्रॉक्सी' (छद्म) समूहों को मिल रही बाह्य तकनीकी शक्तियों का प्रतिकार। एकीकृत रक्षा स्टाफ द्वारा जारी 'डिफेंस फोर्सेज विजन 47' इसी डिजिटल विभीषिका का सामना करने के लिए 'ड्रोन बल' की आवश्यकता पर बल देता है।
अतीत में जंगलों की सघन परतें (कैनोपी) निगरानी में सबसे बड़ी बाधा थीं, किंतु आधुनिक ड्रोन तकनीक ने इस अवरोध को एक सामरिक अवसर में बदल दिया है। सामान्य ड्रोन जहां जैमिंग (जैमिंग) और नेटवर्क के अभाव में पंगु हो जाते थे, वहां अब 'टेदर्ड ड्रोन' (केबल से जुड़े ड्रोन) एक अचूक समाधान बनकर उभरे हैं। ये ड्रोन केबल के माध्यम से निरंतर ऊर्जा और अटूट सिग्नल प्राप्त करते हैं, जिससे वे 24 घंटे से अधिक समय तक स्थिर रहकर सूक्ष्म से सूक्ष्म गतिविधि पर दृष्टि रख सकते हैं।
भारतीय सेना अब 'सॉफ्ट-किल' और 'हार्ड-किल' प्रणालियों का एक सघन जाल बुन रही है। जहां 'सॉफ्ट-किल' विधियों में सैटेलाइट नेविगेशन और रेडियो फ्रीक्वेंसी को स्पूफ (स्पूफ) करना शामिल है, वहीं 'हार्ड-किल' तकनीक में 30 से 300 किलोवाट तक के 'डायरेक्टेड-एनर्जी' हथियार (लेजर गन) तैनात किए जा रहे हैं। सक्षम, आकाशतीर और डी-4 जैसे सिस्टम अब रडार, थर्मल इमेजिंग और इन्फ्रारेड ट्रैकिंग के संगम से एक ऐसी अभेद्य दीवार खड़ी कर रहे हैं, जिसे पार करना किसी भी 'स्वॉर्म ड्रोन' (ड्रोन झुंड) के लिए असंभव होगा।
पूर्वोत्तर के जंगल अब मौन नहीं हैं; वे डिजिटल तरंगों से स्पंदित हैं। यह एक ऐसा युद्ध है जहां शत्रु अदृश्य है और अस्त्र डिजिटल हैं। भारत के ड्रोन बलों और थिएटर कमांड्स को अब एक ऐसी मानसिकता के साथ आगे बढ़ना होगा जहां तकनीक ही ढाल है और डेटा ही तलवार। यदि हम इस उभरते 'पैनॉप्टिकॉन' को समय रहते नियंत्रित करने में विफल रहे, तो हमारे अभेद्य जंगल हमारे लिए ही एक पारदर्शी युद्धक्षेत्र बन जाएंगे।