आकाश की विवशता

गगन की अनंत सीमाओं को सुरक्षित रखने वाले वायुसैनिकों का भविष्य आज तकनीकी विलंब और नीतिगत जड़ता के भंवर में फंसा है। स्वदेशी संकल्पों की विफलता ने भारतीय वायुसेना को पुराने प्लेटफॉर्मों और विदेशी निर्भरता की विवशता के कठोर धरातल पर ला खड़ा किया है।

15 Apr 2026  |  29

किसी भी सैन्य शक्ति की सामर्थ्य केवल उसके अग्रिम पंक्ति के लड़ाकू विमानों से नहीं, बल्कि उस नींव से मापी जाती है जिस पर उसके योद्धा निर्मित होते हैं। स्थिर और सुदृढ़ आधारभूत संरचनाएं विश्व भर की सेनाओं को रणनीतिक बढ़त प्रदान करती हैं। किंतु, भारतीय वायुसेना (आईएएफ) के परिप्रेक्ष्य में, यह आधार आज जर्जर प्रतीत होता है। वायुसैनिकों के प्रशिक्षण में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों की गुणवत्ता और उनकी उपलब्धता में निरंतर गिरावट ने एक भयावह विद्रूपता उत्पन्न कर दी है। पिछले पांच दशकों में भारतीय आकाश ने जगुआर, मिराज-2000, सुखोई-30एमकेआई और राफेल जैसे अत्याधुनिक विदेशी विमानों की गर्जना तो सुनी, किंतु इन विमानों को उड़ाने वाले जांबाजों को प्रशिक्षित करने वाले स्वदेशी 'ट्रेनर' विमानों की कथा अत्यंत करुण और निराशाजनक रही है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: पिस्टन इंजन से जेट तक का अधूरा स्वप्न
वायुसेना के प्रशिक्षण दर्शन का मूल सिद्धांत यह रहा है कि प्रत्येक प्रशिक्षु पायलट को एक मानकीकृत और त्रि-स्तरीय प्रशिक्षण प्रक्रिया से गुजरना अनिवार्य है। इसमें टर्बोप्रॉप और जेट उड़ान का सघन अनुभव सम्मिलित है, जिसके पश्चात ही उसे फाइटर, परिवहन या हेलीकॉप्टर जैसे विशिष्ट संवर्गों के योग्य माना जाता है।
1960 के दशक के प्रारंभ से 2009 तक, यह यात्रा एचटी-2 और एचपीटी-32 जैसे स्वदेशी पिस्टन-इंजन विमानों पर टिकी थी। 1950 के दशक में निर्मित 'हिंदुस्तान ट्रेनर-2' ने तीन दशकों तक सेवा दी, जिसके पश्चात उसे एचपीटी-32 से प्रतिस्थापित किया गया। विडंबना यह थी कि एचपीटी-32 अपने जन्म के समय ही तकनीकी रूप से पुराना हो चुका था। टर्बोप्रॉप तकनीक की आवश्यकता को पूर्ण करने में अक्षम यह विमान दो दशकों तक रखरखाव की गंभीर समस्याओं और इंजन की अनिश्चितता से जूझता रहा।
2009: एक विभीषिका और रणनीतिक विवशता
वर्ष 2000 के पश्चात वायुसेना ने बार-बार सरकार को सचेत किया कि पिस्टन-इंजन वाले प्रशिक्षु विमान अब मृत्यु के जाल बन चुके हैं। उनकी मांग को तब गंभीरता से लिया गया जब एचपीटी-32 के इंजन की विफलता के कारण कई भीषण दुर्घटनाएं हुईं और राष्ट्र ने अपने अनमोल पायलटों को खो दिया। 2009 में इस विमान को अंततः सेवामुक्त कर दिया गया। किंतु, उस समय भारत के पास कोई स्वदेशी विकल्प उपलब्ध नहीं था। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के दावों के विपरीत, धरातल शून्य था। इस शून्य को भरने के लिए वायुसेना को विवश होकर अपने पुराने 'एचजेटी-16 किरण' जेट ट्रेनर को बुनियादी प्रशिक्षण के लिए प्रयुक्त करना पड़ा - जो तकनीकी रूप से एक जोखिमपूर्ण कदम था।
पिलाटस सौदा और एचएएल का अवरोध
2009 में वायुसेना ने 75 बुनियादी प्रशिक्षण विमानों के लिए अंतरराष्ट्रीय निविदा जारी की। 2011 में स्विस निर्मित 'पिलाटस पीसी-7' का चयन हुआ, जो समकालीन और आधुनिक टर्बोप्रॉप तकनीक से सुसज्जित था। इस सौदे में 38 अतिरिक्त विमान खरीदने का विकल्प भी सम्मिलित था।
यहीं से स्वदेशी राजनीति और रणनीतिक यथार्थ का द्वंद्व प्रारंभ हुआ। एचएएल ने रक्षा मंत्रालय को इस सौदे को रोकने का परामर्श दिया और स्वयं के वित्तपोषण से 'एचटीटी-40' विकसित करने का प्रस्ताव रखा। वायुसेना का संदेह न्यायसंगत था, क्योंकि 1999 से एचएएल 'एचजेटी-36 सितारा' (इंटरमीडिएट जेट ट्रेनर) के विकास में निरंतर विफल रहा था। जिस संस्थान ने एक दशक से अधिक समय में एक इंटरमीडिएट ट्रेनर नहीं दिया, वह तीन-चार वर्षों में बुनियादी ट्रेनर कैसे प्रदान करेगा? इसी अविश्वास के कारण वायुसेना ने 75 पिलाटस विमानों की खरीद को प्राथमिकता दी।
किंतु, एचएएल के अवरोध और नीतिगत संशय के कारण वायुसेना अतिरिक्त 38 पिलाटस विमानों के विकल्प का उपयोग नहीं कर सकी। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि एचएएल द्वारा प्रस्तावित एचटीटी-40, जो पिलाटस का पूरक होना था, स्वयं देरी के कुहासे में विलीन हो गया। आज, एचएएल के वादे के एक दशक पश्चात भी यह प्लेटफॉर्म सेवा में पूरी तरह सक्रिय नहीं है।
मौजूदा संकट: किरण और हॉक के बीच की दरार
हिंदुस्तान जेट ट्रेनर-16 (किरण) की कहानी भारतीय उड्डयन के संघर्ष का प्रतीक है। यह 1950 के दशक के 'जेट प्रोवोस्ट' का लाइसेंस प्राप्त संस्करण है, जिसे रॉयल एयर फोर्स ने 1993 में ही विसर्जित कर दिया था। भारत ने इसे 1968 में अंगीकार किया और पिछले 40 वर्षों से यह हमारी रीढ़ बना हुआ है। यद्यपि 2006 में 'हॉक' विमानों के आगमन से कुछ राहत मिली, किंतु किरण के उन्नत संस्करण आज भी फ्लाइंग अकादमियों में अंतिम सांसें ले रहे हैं।
1980 के दशक में 'एडवांस्ड जेट ट्रेनर' (एजेटी) की अनुपलब्धता ने वायुसेना को उस स्थिति में धकेला जहां नए पायलटों को सीधे किरण से जगुआर और मिग जैसे शक्तिशाली विमानों में भेजा गया। यह व्यवस्था न केवल जोखिमपूर्ण थी, बल्कि वायुसैनिकों के कौशल विकास के लिए भी अपर्याप्त थी। 2006 में ब्रिटिश 'हॉक' के आने से इस स्थिति में सुधार हुआ, किंतु बुनियादी और इंटरमीडिएट स्तर पर संकट यथावत रहा।
'सितारा' का अवसान और 'यशस' का संशय
वायुसेना के समक्ष वर्तमान में सबसे बड़ी चुनौती 'एचजेटी-16 किरण' को 'एचजेटी-36 सितारा' से प्रतिस्थापित करने की है। एचजेटी-36 के विकास पर 4,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि स्वाहा करने के पश्चात भी इसकी प्रामाणिकता शून्य है। तकनीकी विसंगतियों और डिजाइन की त्रुटियों ने इसे एक 'असिद्ध' प्लेटफॉर्म बना दिया है। एचएएल द्वारा इसे 'यशस' का नया नाम देने और ग्लास कॉकपिट लगाने के उपरांत भी वायुसेना इसके प्रदर्शन को लेकर आशंकित है।
इस विफलता का कोलेटरल डैमेज (पार्श्व क्षति) यह है कि वायुसेना अब हेलीकॉप्टर और परिवहन पायलटों को सीधे बुनियादी पिलाटस ट्रेनर से 'चेतक' हेलीकॉप्टरों या 'डोर्नियर' विमानों पर भेज रही है। यह प्रशिक्षण श्रृंखला के उस 'इंटरमीडिएट' चरण की हत्या है, जो एक पायलट के मानसिक और तकनीकी विकास के लिए अनिवार्य होता है।
उत्तरदायित्व का प्रश्न
एचएएल निरंतर 'बदलती आवश्यकताओं' और 'लक्ष्य परिवर्तन' का तर्क देकर अपनी देरी को उचित ठहराने का प्रयास करता रहा है। किंतु सैन्य विमानन की मूल्य श्रृंखला में एक आधुनिक प्रशिक्षण विमान की अनुपलब्धता वायुसेना के व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र (ईकोसिस्टम) को पंगु बना रही है। जब प्रशिक्षण के स्तर पर ही समझौता किया जाता है, तो उसका प्रभाव लड़ाकू स्क्वाड्रन की मारक क्षमता और सुरक्षा पर पड़ता है।
अर्जुन सुब्रमण्यम (सेवानिवृत्त एयर वाइस मार्शल) का यह विश्लेषण हमें उस वास्तविकता से रूबरू कराता है जहां 'आत्मनिर्भर भारत' का नारा एचएएल की अकर्मण्यता और तकनीकी जड़ता के कारण धूमिल होता दिख रहा है। वायुसेना को आज कल के वादों की नहीं, बल्कि आज के विश्वसनीय प्लेटफॉर्मों की आवश्यकता है। यदि स्वदेशी संस्थान इस चुनौती को स्वीकार करने में विफल रहते हैं, तो राष्ट्र को अपनी सुरक्षा के लिए पुनः विदेशी देहरियों पर मस्तक झुकाना होगा - जो संप्रभुता के लिए एक सुखद संकेत नहीं है। n