रसोई का संकट

पश्चिम एशिया के रक्तवर्ण क्षितिज से उठी युद्ध की लपटों ने दिल्ली की रसोइयों को शीतलता और धुएं के आगोश में धकेल दिया है। आधुनिकता का उज्ज्वल स्वप्न आज हॉर्मुज जलडमरूमध्य के सामरिक अवरोधों और खाली सिलेंडरों की लंबी कतारों के बीच दम तोड़ रहा है।

15 Apr 2026  |  50

दिल्ली के कई मोहल्लों में सूर्योदय की पहली किरण फूटने से बहुत पहले ही कतारें अपनी जड़ें जमा लेती हैं। भोर के चार बजते-बजते, जब शहर का एक बड़ा हिस्सा गहरी निद्रा में होता है, गैस वितरकों के द्वारों पर एक भिन्न प्रकार का जनसैलाब उमड़ पड़ता है। इस कतार में कोई भेद नहीं है - दिहाड़ी मजदूर, गृहणियां, रेहड़ी-पटरी वाले और छोटे रेस्तरां संचालक, सभी की आंखों में एक ही व्याकुलता है: एक सिलेंडर की प्राप्ति। इनमें से अधिकांश लोग दोपहर तक खाली हाथ, थके हुए कदमों के साथ वापस लौट जाते हैं। यह केवल ईंधन की कमी नहीं है, बल्कि एक महानगरीय सभ्यता के विश्वास का टूटना है।
रसोई गैस की अनुपस्थिति में घरों के भीतर जो दृश्य उभर रहे हैं, वे समय के चक्र को पीछे घुमाने जैसा अनुभव कराते हैं। दिल्ली की आधुनिक कॉलोनियों के पड़ोस में स्थित बस्तियों में परिवार संसाधनों को एकत्रित कर सामूहिक रसोई का सहारा ले रहे हैं। कहीं कोयले की अंगीठी सुलग रही है, तो कहीं जलाऊ लकड़ी और उपलों (गोबर) का उपयोग कर भोजन पकाने का आदिम प्रयास किया जा रहा है। दो वक्त की रोटी सुनिश्चित करना अचानक एक थका देने वाला दैनिक संग्राम बन चुका है।
आंकड़ों का शिखर और यथार्थ की ढलान
राजधानी के कुछ हिस्सों में उभर रहे ये दृश्य भारत की ऊर्जा नीति के पिछले एक दशक के पथ के बिल्कुल विपरीत खड़े हैं। देश में आज घरेलू एलपीजी कनेक्शनों की संख्या 32.83 करोड़ से अधिक है, जो 2014 के 14.52 करोड़ से एक लंबी छलांग थी। यह स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन तक व्यापक पहुंच का एक गौरवशाली अध्याय था। किंतु, वर्तमान व्यवधान ने इस उपलब्धि पर अनिश्चितता का कुहासा फैला दिया है।
इस संकट की जड़ें पश्चिम एशिया के उस ज्वालामुखी में निहित हैं, जो 28 फरवरी 2026 को फटा था। अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए व्यापक हमलों ने तेहरान को जवाबी कार्रवाई के लिए विवश किया, जिसके परिणामस्वरूप फारस की खाड़ी में जहाजों की आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए। ईरान ने इजराइल और खाड़ी के अमेरिकी समर्थक देशों पर हमले तेज कर दिए हैं, जिससे वाणिज्यिक नौवहन के मन में गहरा भय व्याप्त हो गया है।
हॉर्मुज: वैश्विक अर्थव्यवस्था की महाधमनी
इस व्यवधान के केंद्र में 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' है - ईरान और ओमान के बीच का वह संकरा समुद्री मार्ग जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। विश्व की लगभग पांचवां हिस्सा तेल और गैस की आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। भारत के लिए यह जलमार्ग किसी 'महाधमनी' से कम नहीं है। देश के कच्चे तेल के आयात का लगभग 40-50 प्रतिशत, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का आधा हिस्सा और एलपीजी खेप का एक बड़ा भाग इसी संकरे मार्ग से होकर गुजरता है।
नई दिल्ली जैसे शहरों में रसोई गैस की आपूर्ति में अचानक आई कमी इसी सामरिक जकड़न का परिणाम है। घरों में 'पैनिक बाइंग' (घबराहट में खरीद) बढ़ गई है, जबकि रेस्तरां और सड़क किनारे भोजन बेचने वाले, जो पूरी तरह से 19 किलोग्राम के व्यावसायिक सिलेंडरों पर निर्भर हैं, सबसे भीषण मार झेल रहे हैं। कई भोजनालयों ने या तो अस्थायी रूप से शटर गिरा दिए हैं या अपने परिचालन को न्यूनतम स्तर पर ले आए हैं। हॉस्टलों और कैंटीनों में भोजन की राशनिंग शुरू हो गई है।
नदिया और मिट्टी के चूल्हे की त्रासदी
ओखला फेज 2 की एक तंग और भीड़भाड़ वाली झुग्गी बस्ती में, जहां छोटे-छोटे घर एक-दूसरे से सटे हुए हैं, ढांचों के बीच का एक खुला टुकड़ा 'साझा रसोई' में तब्दील हो गया है। यहाँ पांच परिवार - हिंदू और मुस्लिम दोनों - एक ही मिट्टी के चूल्हे के चारों ओर अपनी बारी का इंतजार करते हैं। जमीन कालिख से काली पड़ चुकी है, दीवारें धुएं से धूसर हैं और हवा में वह सघन धुआं व्याप्त है जो आग बुझने के काफी बाद तक फेफड़ों में चुभता रहता है।
राजस्थान की मूल निवासी नदिया चूल्हे के पास बैठी अपनी सब्जी चला रही है। दो कमरों के एक कच्चे-पक्के मकान में रहने वाली नदिया बीच-बीच में अपनी आंखें पोंछती है - कभी धुएं के कारण, तो कभी थकान से। वह कहती है, 'पिछले चार-पांच दिनों से हम इसी चूल्हे पर खाना बना रहे हैं। न जगह है, न लकड़ी आसानी से मिलती है। धुएं ने जीना मुहाल कर दिया है, पर विकल्प क्या है? सिलेंडर बुक किए 10 दिन हो गए, अब तक नहीं आया।' यहाँ के अधिकांश निवासी दिहाड़ी मजदूर हैं, जिनकी आय अनिश्चित है। पास खड़ी एक अन्य महिला कहती है, 'कभी काम मिलता है, कभी नहीं। ऐसे में दो-तीन हजार रुपये कालाबाजारी में देना हमारे बस की बात नहीं है।'
अदृश्य कोलेटरल डैमेज: रिहाना और पपिया की व्यथा
यह संकट केवल चूल्हे तक सीमित नहीं है, इसके सामाजिक दुष्प्रभाव गहरे हैं। जय हिंद कैंप में महिलाएं सुबह 6 बजे से लाइन में लगती हैं और दोपहर 2 बजे तक प्रतीक्षा करने के बाद उन्हें अगले दिन आने को कह दिया जाता है। पपिया नामक निवासी ने बताया कि उन्हें दो दिनों तक बाहर के भोजन पर निर्भर रहना पड़ा, जो उनके लिए 'आर्थिक रूप से वहनीय' नहीं था।
रिहाना, जो वसंत कुंज की एक पॉश गेटेड सोसायटी में घरेलू सहायिका के रूप में कार्य करती है, कहती है कि इन लंबी कतारों ने उसकी नौकरी को खतरे में डाल दिया है। 'मेरी मालकिन कहती है कि एक घंटे से ज्यादा मत लगाओ। पर एक घंटे में कैसे होगा? आधा दिन लाइन में निकल जाता है, फिर घर आकर सारा काम भी करना पड़ता है।' मध्यम वर्ग की एक महिला के शब्द इस वर्ग की नियति को स्पष्ट करते हैं: 'हम गरीब हैं, इसलिए घंटों कतार में खड़े रहना हमारी वास्तविकता है। जब भी संकट आता है, हम जैसे लोग ही सबसे पहले शिकार होते हैं।'
आयात पर निर्भरता और मूल्य वृद्धि का चक्र
भारत की ऊर्जा सुरक्षा का ढांचा यद्यपि सुदृढ़ है, किंतु आयात पर उसकी निर्भरता उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी रिफाइनरियां देश की एलपीजी मांग का केवल 40 प्रतिशत ही पूरा कर पाती हैं। शेष 60 प्रतिशत हिस्सा सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका जैसे देशों से आयात किया जाता है।
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएक) के आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन दशकों में भारत की एलपीजी खपत में छह गुना से अधिक की वृद्धि हुई है - 1998-99 के 446 हजार मीट्रिक टन से बढ़कर 2025-26 में 2,754 हजार मीट्रिक टन। इस अवधि में प्राकृतिक गैस पाइपलाइन नेटवर्क भी 15,000 किमी से बढ़कर 25,000 किमी हो गया। उद्देश्य स्पष्ट था: करोड़ों घरों को पारंपरिक ईंधन से मुक्त कर एक आधुनिक ऊर्जा प्रणाली में लाना। किंतु, अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क 'सऊदी अनुबंध मूल्य' में हुई 63 प्रतिशत की वृद्धि ने इस तंत्र पर भारी दबाव डाल दिया है। वर्तमान में दिल्ली में 14.2 किलो के सिलेंडर की कीमत 803 रुपये है, जबकि उज्ज्वला लाभार्थियों के लिए यह प्रभावी रूप से 503 रुपये है। किंतु कालाबाजारी ने इन कीमतों को अप्रासंगिक बना दिया है।
गोविंदपुरी में रहने वाले संजय सिंह पिछले 25 वर्षों से समोसे, लिट्टी और आलू चाट की रेहड़ी चला रहे हैं। महज पांच रुपये प्रति आइटम बेचने वाले संजय दिन भर में बमुश्किल 200-400 रुपये बचा पाते हैं, जिससे उनका सात-आठ सदस्यों का परिवार पलता है। एलपीजी की कमी ने उनके चूल्हे और धंधे, दोनों को ठंडा कर दिया है। 'पिछले आठ दिनों से रेहड़ी बंद है। घरेलू सिलेंडर भी छह दिन बाद मिला। मेरी बेटी सुबह 6 बजे से 10 बजे तक लाइन में लगी, तब जाकर एक पर्ची मिली।' संजय ने कालाबाजारी में 400-500 रुपये प्रति किलो गैस भरने की कोशिश की, पर वह भी अब संभव नहीं है। आय का स्रोत बंद होने और बेटे के एक्सीडेंट के कारण बढ़ते खर्चों ने उन्हें गांव लौटने पर विचार करने को मजबूर कर दिया है।
ऐसी ही कहानी 'गुप्त जी' की है, जो छोले-पूरी का स्टाल लगाते हैं। गैस की कमी से उनका कारोबार आधा रह गया है। ऑनलाइन बुकिंग का कोई जवाब नहीं मिल रहा। स्टाल चलाने के लिए उन्होंने घर का सिलेंडर उपयोग किया, जिससे बच्चों को उनकी दादी के घर भेजना पड़ा। 'स्टाल पर पांच कर्मचारी काम करते हैं, उनके लिए पैसे कहाँ से लाऊं? स्थिति यही रही तो दुकान पूरी तरह बंद करनी होगी।'
शिक्षा के केंद्रों में पसरता सन्नाटा
एलपीजी संकट ने गोविंदपुरी और ओखला जैसे क्षेत्रों में रहने वाले उन हजारों छात्रों को भी प्रभावित किया है जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। यहाँ के पीजी और हॉस्टल, जो छात्रों को भोजन उपलब्ध कराते हैं, अब भोजन की थाली छोटी कर रहे हैं। रोटियों की संख्या कम हो गई है, सब्जियों की विविधता लुप्त हो गई है।
ओखला फेज 2 के एक पीजी में कर्मचारी अब गोबर के उपलों और लकड़ी पर खाना बना रहे हैं। ओखला के एक पीजी केयरटेकर आलम बताते हैं, 'हम सुबह 3 बजे उठकर लकड़ी का चूल्हा जलाते हैं ताकि 7 बजे तक नाश्ता तैयार हो सके। पूरा हॉल धुएं से भर जाता है, पर बच्चों को भूखा नहीं रख सकते।' फास्ट फूड, जो कभी सप्ताहांत का आनंद था, अब एक 'विशेषाधिकार' बन चुका है।
सरकारी तंत्र और जनता का संशय
बढ़ती चिंता के बीच, पेट्रोलियम मंत्रालय ने सभी घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण (ई-केवाईसी) अनिवार्य कर दिया है। मंत्रालय का दावा है कि गैस की पर्याप्त उपलब्धता है और समस्या 'जमाखोरी' के कारण उत्पन्न हुई है। एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि लोग डर के मारे सिलेंडर जमा कर रहे हैं, जिससे कृत्रिम कमी पैदा हुई है।
किंतु जय हिंद कैंप में कतार में खड़े अनवर हुसैन जैसे लोगों के लिए ये स्पष्टीकरण किसी काम के नहीं हैं। 'अगर उपलब्धता समस्या नहीं है, तो फिर इतनी भ्रम की स्थिति और इतनी लंबी लाइनें क्यों हैं? पहले नोटबंदी की कतारें और अब गैस की - इस सरकार के साथ समस्याएं कभी खत्म नहीं होतीं।'
राजनयिक संतुलन और भविष्य की चुनौती
भारत इस समय पश्चिम एशिया में एक अत्यंत नाजुक राजनयिक संतुलन बना रहा है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने तेहरान के साथ निरंतर बातचीत की पुष्टि की है। भारत के इजराइल के साथ घनिष्ठ संबंध हैं और अमेरिका के साथ बढ़ता रणनीतिक सहयोग है, किंतु ईरान के साथ उसके पुराने राजनैतिक और आर्थिक हित जुड़े हैं। नई दिल्ली के लिए खाड़ी में वाणिज्यिक नौवहन मार्गों की सुरक्षा केवल एक भू-राजनीतिक चिंता नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आर्थिक 
आवश्यकता है।
धुएं से घिरा भविष्य
मार्च 2026 का यह एलपीजी संकट केवल एक ईंधन की कमी नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी है कि हमारी 'स्वच्छ ऊर्जा' का भविष्य कितनी असुरक्षित धागों से बंधा है। जब तक हॉर्मुज की धमनियां युद्ध के अवरोधों से मुक्त नहीं होतीं, तब तक गोविंदपुरी की शीला को बुखार में लकड़ी पर खाना बनाना पड़ेगा और संजय सिंह की रेहड़ी बंद रहेगी।
आंकड़ों और योजनाओं के भव्य महलों के नीचे, आज भारत की एक बड़ी आबादी धुएं और कालिख के उस अतीत में लौटने को विवश है, जिसे वह पीछे छोड़ आई थी। यह संकट सिद्ध करता है कि 21वीं सदी में युद्ध का भूगोल भले ही सात समंदर पार हो, उसकी आंच सीधे गरीब की थाली तक पहुंचती है। भारत को अपनी ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए केवल कूटनीति नहीं, बल्कि सामरिक विकल्पों और घरेलू उत्पादन के सुदृढ़ीकरण की ओर देखना होगा। अन्यथा, भविष्य की हर मिसाइल का धमाका हमारे रसोई घरों में शांति का अंत करता रहेगा।