आरा/बक्सर: बिहार की राजनीति में आरा-बक्सर स्थानीय प्राधिकार विधान परिषद सीट के उपचुनाव ने सत्ता और विपक्ष दोनों को हैरान कर दिया है। दशकों से राधाचरण शाह 'सेठ जी' के प्रभाव वाली इस सीट पर जेडीयू को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। आरजेडी प्रत्याशी सोनू कुमार राय ने 359 मतों से जीत दर्ज कर न केवल महागठबंधन में नई ऊर्जा भर दी है, बल्कि एनडीए के भीतर आत्ममंथन का दौर भी शुरू कर दिया है।

दिलचस्प पृष्ठभूमि: 'सेठ जी' की विरासत पर संकट

यह सीट राधाचरण शाह उर्फ सेठ जी के विधायक बनने के बाद खाली हुई थी। कभी जलेबी की दुकान चलाने वाले सेठ जी का एमएलसी से एमएलए बनने का सफर बेहद दिलचस्प रहा है। जेडीयू ने उनकी विरासत संभालने के लिए उनके पुत्र कन्हैया प्रसाद को मैदान में उतारा था, लेकिन जनता और कार्यकर्ताओं ने इस 'विरासत' को नकार दिया।

जेडीयू की हार के 5 प्रमुख कारण:

कारणप्रभाव
पैराशूट उम्मीदवारकन्हैया प्रसाद को उम्मीदवार बनाने से पहले वह पार्टी के सदस्य तक नहीं थे, जिससे कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश था।
बागियों का वारबागी उम्मीदवार मनोज उपाध्याय को मिले 636 वोटों ने सीधे तौर पर जेडीयू के वोट बैंक में सेंध लगाई।
राजपूतों की नाराजगीपिछले लोकसभा चुनाव में राधाचरण शाह के असहयोग से नाराज सवर्ण मतदाताओं ने इस बार बेरुखी दिखाई।
संगठनात्मक विफलताआरजेडी सांसद सुधाकर सिंह और माले नेता अजीत कुशवाहा की माइक्रो-लेवल प्लानिंग ने बाजी पलट दी।
कार्यकर्ताओं की उपेक्षास्थानीय जमीन पर तैयारी कर रहे नेताओं को नजरअंदाज कर बाहरी को टिकट देना घातक रहा।

महाबंधन की 'माइक्रो' प्लानिंग और सुधाकर सिंह का जादू

जहाँ एक तरफ जेडीयू के भीतर अंतर्कलह थी, वहीं महागठबंधन ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। बक्सर के आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह ने चुनाव की कमान संभालते हुए धरातल पर रणनीति तैयार की। साथ ही, विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद माले नेता अजीत कुशवाहा की सक्रियता ने वैश्य और पिछड़े वर्गों की गोलबंदी को महागठबंधन के पक्ष में मोड़ दिया।

बदलते समीकरण: 'सेठ जी' का तिलिस्म टूटा?

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी नेता राजकुमार सिंह की हार के समय से ही क्षेत्र में सवर्ण मतदाताओं और एनडीए के बीच दूरियां बढ़ गई थीं। राधाचरण शाह और एनडीए के स्थानीय विधायकों के बीच समन्वय की कमी ने इस उपचुनाव में आग में घी डालने का काम किया।

नतीजा: 340 मतों के अंतर से मिली यह जीत आरजेडी के लिए एक नई उम्मीद की किरण बनकर उभरी है, जबकि जेडीयू के लिए यह संकेत है कि स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी महंगी पड़ सकती है।