गुवाहाटी: पूर्वोत्तर के सबसे महत्वपूर्ण राज्य असम में राजनीतिक पारा अपने चरम पर है। राज्य 9 अप्रैल, 2026 को होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पूरी तरह तैयार है। एक ही चरण में होने वाले इस मतदान में मुख्य मुकाबला सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और विपक्ष के बीच है। भाजपा जहाँ अपनी तीसरी लगातार जीत (हैट्रिक) का लक्ष्य लेकर चल रही है, वहीं विपक्ष सत्ता में वापसी की पुरजोर कोशिश कर रहा है।

असम की राजनीति में पिछले एक दशक में आए बदलावों और आगामी चुनावों के समीकरणों पर एक विस्तृत नज़र:

इतिहास के पन्नों से: 2016 और 2021 का जनादेश

असम की राजनीति में साल 2016 एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ था। कांग्रेस के 15 साल के शासन को उखाड़ फेंकते हुए भाजपा पहली बार सत्ता में आई थी।

2016 का चुनाव: सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व में भाजपा ने 'अवैध अप्रवासन' जैसे मुद्दों पर आक्रामक अभियान चलाया। 126 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 60 सीटें जीतीं। अपने सहयोगियों (AGP और BPF) के साथ मिलकर गठबंधन ने कुल 86 सीटें हासिल कीं और राज्य में पहली बार कमल खिला।

2021 का चुनाव: इतिहास ने खुद को दोहराया और भाजपा ने एक बार फिर 60 सीटों पर जीत दर्ज की। इस बार कमान हिमंत बिस्वा सरमा को सौंपी गई, जिन्होंने असम के 15वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

प्रमुख दलों का प्रदर्शन: एक तुलनात्मक दृष्टि

राजनीतिक दल2011 की सीटें2016 की सीटें2021 की सीटें
भारतीय जनता पार्टी (BJP)056060
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस782629
असम गण परिषद (AGP)101409
AIUDF181316

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विपक्ष की चुनौतियाँ और समीकरण

कांग्रेस, जिसने तरुण गोगोई के नेतृत्व में 2001 से 2011 तक राज किया था, पिछले दो चुनावों से संघर्ष कर रही है। 2016 में पार्टी केवल 26 सीटों पर सिमट गई थी। वहीं, वामपंथी दलों (CPM) का प्रदर्शन भी निराशाजनक रहा है; 2016 में 19 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद उनका खाता तक नहीं खुल सका था।

2026 के चुनावों में भाजपा के सामने अपनी विकास योजनाओं और 'असमिया पहचान' के मुद्दे को बरकरार रखने की चुनौती होगी, जबकि विपक्ष एकजुट होकर एंटी-इन्कंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) का लाभ उठाने की कोशिश करेगा।

निष्कर्ष: 9 अप्रैल पर टिकी हैं निगाहें

9 अप्रैल को होने वाला मतदान यह तय करेगा कि हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा अपना किला बचाने में सफल रहती है या असम की जनता बदलाव का रास्ता चुनती है। सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच, इस बार का चुनाव पूर्वोत्तर की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेगा।

क्या आपको लगता है कि सीमा सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के विकास जैसे मुद्दे इस बार भी भाजपा को बहुमत दिलाने में सफल रहेंगे, या स्थानीय मुद्दे समीकरण बदल देंगे?