पटना।

बिहार की राजधानी पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट इस समय देश के सबसे बड़े सियासी अखाड़े में तब्दील हो चुकी है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई इस सीट पर आगामी 30 जुलाई को उपचुनाव होने जा रहा है। यह चुनाव महज एक विधायक चुनने का जरिया नहीं है, बल्कि यह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के कद, पद और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की प्रतिष्ठा की अग्निपरीक्षा बन गया है।

चुनावी महाभारत: प्रशांत किशोर और महागठबंधन तैयार

चुनाव की तारीखों का एलान होते ही बांकीपुर का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। हालांकि अभी तक किसी भी दल ने अपने उम्मीदवारों के पत्तों का खुलासा नहीं किया है, लेकिन दावेदारों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है।

किले को भेदने की तैयारी:

साल 1995 से अब तक अजेय रहे भाजपा के इस गढ़ को ढहाने के लिए विपक्ष ने चक्रव्यूह रचना शुरू कर दिया है। 'जन सुराज' के सूत्रधार प्रशांत किशोर इस चुनावी महाभारत में खुद सीधे ताल ठोकने का मन बना चुके हैं, जबकि विपक्षी महागठबंधन की ओर से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) भी अपना मजबूत प्रत्याशी उतारने की पूरी तैयारी में है।

बांकीपुर का इतिहास: तीन दशक से सिर्फ 'नवीन' परिवार का राज

बांकीपुर सीट का इतिहास बेहद दिलचस्प है और यह पूरी तरह भाजपा के पारंपरिक गढ़ के रूप में जानी जाती है:

पटना पश्चिम से बांकीपुर का सफर: वर्ष 2008 में हुए परिसीमन से पहले इस विधानसभा क्षेत्र को 'पटना पश्चिम' के नाम से जाना जाता था।

नवीन किशोर सिन्हा का दौर: नितिन नवीन के पिता नवीन किशोर सिन्हा ने पहली बार 1995 में यहां से जीत दर्ज की थी। तब से लेकर आज तक इस सीट पर बीजेपी का एकछत्र राज है।

उपचुनाव से शुरू हुआ सफर: साल 2005 में नवीन किशोर सिन्हा के असामयिक निधन के बाद नितिन नवीन ने राजनीति में कदम रखा। साल 2006 में हुए उपचुनाव में जीतकर वे पहली बार विधानसभा पहुंचे और तब से लगातार वे ही यहां का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।

बीजेपी ने झोंकी पूरी ताकत, अग्निपरीक्षा का समय

दिलचस्प संयोग है कि नितिन नवीन की मुख्यधारा की सियासत 20 साल पहले एक उपचुनाव से ही शुरू हुई थी। आज जब वे देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच चुके हैं, तब एक बार फिर उनके गृह क्षेत्र का उपचुनाव उनके राजनीतिक प्रभाव का फैसला करेगा।

बीजेपी ने अपनी इस पारंपरिक विरासत और राष्ट्रीय अध्यक्ष की साख को बचाने के लिए मैदान में अपनी पूरी सांगठनिक ताकत झोंक दी है। अब देखना यह होगा कि क्या विपक्ष इस अभेद्य किले में सेंध लगा पाता है या बांकीपुर एक बार फिर भाजपा के पाले में ही रहता है।