कोलकाता: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी जनसभाओं में भाजपा को घेरने के लिए एक त्रिस्तरीय रणनीति अपनाई है। वह न केवल स्थानीय भावनाओं को उभार रही हैं, बल्कि आर्थिक और लोकतांत्रिक मुद्दों को भी अपनी रैलियों का केंद्र बना रही हैं।

1. 'थाली' पर सियासत: खान-पान की आजादी

ममता बनर्जी अपनी लगभग हर रैली में बंगाल की संस्कृति और खान-पान का जिक्र कर रही हैं।

आरोप: उनका कहना है कि भाजपा शासित राज्यों में खान-पान पर कड़े प्रतिबंध हैं। यदि भाजपा बंगाल में सत्ता में आती है, तो वह लोगों के मछली, मांस और अंडा खाने पर रोक लगा देगी।

रणनीति: बंगाल में मछली और भात (चावल) केवल भोजन नहीं, बल्कि पहचान का हिस्सा है। ममता इस मुद्दे के जरिए भाजपा को 'शाकाहारी एजेंडा' थोपने वाली पार्टी के रूप में पेश कर रही हैं, ताकि स्थानीय मतदाता असुरक्षित महसूस करें।

2. आलू किसानों का संकट: मुआवज़ा और 'वोट' की अपील

इस साल बंगाल में आलू की रिकॉर्ड 130 लाख टन पैदावार हुई है, जिससे कीमतें गिर गई हैं और किसानों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।

घोषणा: मिदनापुर की रैली में ममता ने स्पष्ट कहा, "अगर आलू पर मुआवज़ा चाहिए, तो तृणमूल को वोट दें।" * राहत के कदम: उन्होंने किसानों के नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजे की घोषणा की है और दूसरे राज्यों में आलू बेचने पर लगी पाबंदियों में ढील दी है। यह कदम सीधे तौर पर ग्रामीण बेल्ट के उन लाखों मतदाताओं को साधने के लिए है जो आलू की खेती पर निर्भर हैं।

3. 'बाहरी' वोटर और फर्जी नामांकन का आरोप

ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर भाजपा पर चुनावी प्रक्रिया में धांधली का गंभीर आरोप लगाया है।

आरोप: ममता का दावा है कि भाजपा ने SIR (Special Investigation Report) के बहाने दूसरे राज्यों के अपने समर्थकों को बंगाल की मतदाता सूची में शामिल कर लिया है।

डेटा और दावा: उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा एजेंटों ने हजारों फर्जी 'फॉर्म 6' जमा किए हैं। उन्होंने इसे "वोटर हाईजैकिंग" करार दिया और कहा कि जो खेल महाराष्ट्र और दिल्ली में खेला गया, वही बंगाल में दोहराने की कोशिश हो रही है।

असर: उन्होंने दावा किया कि इस दोषपूर्ण प्रक्रिया के कारण तनाव में 200 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 60 लाख असली वोटरों के आवेदन अभी भी लंबित हैं।

बीजेपी का पलटवार और चुनावी माहौल

दूसरी ओर, भाजपा इन आरोपों को 'हताशा' बता रही है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि ममता बनर्जी विकास के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए डराने की राजनीति (Fear-mongering) कर रही हैं।

राजनीतिक विश्लेषण: ममता बनर्जी की यह रणनीति 'बंगाली अस्मिता' (Bengali Pride) और 'किसान कल्याण' का मिश्रण है। जहाँ 'खान-पान' और 'बाहरी वोटर' का मुद्दा पहचान की राजनीति को हवा देता है, वहीं 'आलू' का मुद्दा सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। 2026 का यह चुनाव इन भावनात्मक और आर्थिक मुद्दों के इर्द-गिर्द सिमटता नजर आ रहा है।